
छत्तीसगढ़ सरकार की नई आबकारी नीति 2026-27 ने प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। कैबिनेट के ताजा फैसले के मुताबिक अगले वित्तीय वर्ष से शराब कांच की बोतलों के बजाय प्लास्टिक की बोतलों में बेची जाएगी। सरकार ने सभी शराब निर्माता कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे अपने उत्पाद केवल प्लास्टिक पैकिंग में ही सप्लाई करें। इस फैसले का उद्देश्य चाहे जो भी हो लेकिन जमीन पर इसका विरोध तेज हो गया है। बॉटलिंग कारोबार से जुड़े लोग और पर्यावरण प्रेमी इस बदलाव को लेकर चिंता जता रहे हैं।
मंत्री रामविचार नेताम का अजीबोगरीब बयान
जब इस नई नीति और प्लास्टिक के इस्तेमाल से होने वाले कैंसर के खतरे पर कृषि मंत्री रामविचार नेताम से सवाल किया गया तो उनका जवाब हैरान करने वाला था। उन्होंने बेहद हल्के अंदाज में कहा कि उन्हें इस बात का अनुभव नहीं है कि प्लास्टिक की बोतल से कैंसर होता है या कांच की बोतल से। उन्होंने आगे जोड़ा कि जब वे इस बात का अनुभव ले लेंगे तभी कुछ बता पाएंगे। एक जिम्मेदार मंत्री के इस बयान ने जनता और विपक्ष के बीच नाराजगी पैदा कर दी है क्योंकि यह सीधे तौर पर लोगों की सेहत से जुड़ा मामला है।
10 लाख लोगों के रोजगार पर मंडराया संकट
इस फैसले का सबसे बुरा असर शराब की बोतलों की रीसाइक्लिंग और बॉटलिंग के काम में लगे लोगों पर पड़ने वाला है। कारोबारियों का दावा है कि इस एक फैसले से प्रदेश के करीब 10 लाख लोगों की रोजी-रोटी छिन जाएगी। बॉटलिंग प्लांट के मजदूरों से लेकर शहर की गलियों से खाली कांच की बोतलें चुनने वाले छोटे कामगारों तक हर कोई इससे प्रभावित होगा। कांच की बोतलों का एक पूरा चक्र बना हुआ था जिससे लाखों परिवारों का गुजारा होता था जो अब पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है।
पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनेगी प्लास्टिक
विशेषज्ञों और कारोबारियों का मानना है कि इस नीति से छत्तीसगढ़ में हर महीने करीब 10 करोड़ खाली प्लास्टिक बोतलों का कचरा जमा होगा। कांच की बोतलें तो दोबारा इस्तेमाल या रीसायकल हो जाती थीं लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरे का निपटारा करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा। सड़कों और नालियों में जमा होने वाला यह प्लास्टिक प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देगा। लोगों का सवाल है कि क्या सरकार ने इस कचरे के प्रबंधन के लिए कोई ठोस योजना तैयार की है।
सेहत और राजस्व दोनों का होगा नुकसान
बॉटलिंग कारोबारियों का कहना है कि सरकार के इस कदम से न केवल लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि राजस्व को भी करोड़ों का घाटा होगा। प्लास्टिक में शराब रखने से उसकी गुणवत्ता और रासायनिक संरचना में बदलाव की आशंका रहती है जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। मुन्ना खान और मनोज मालिक जैसे कारोबारियों ने सरकार से अपील की है कि वह अपने इस फैसले पर दोबारा विचार करे क्योंकि इससे पर्यावरण सेहत और अर्थव्यवस्था तीनों को चोट पहुंचेगी।
क्या फैसला बदलेगी साय सरकार?
फिलहाल सरकार अपने फैसले पर अडिग नजर आ रही है लेकिन चौतरफा विरोध ने दबाव बना दिया है। एक तरफ बेरोजगारी का डर है तो दूसरी तरफ पर्यावरण और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा। आम जनता भी सोशल मीडिया पर मंत्री के ‘अनुभव’ वाले बयान की आलोचना कर रही है। अब देखना होगा कि क्या सरकार जनहित को ध्यान में रखते हुए कांच की बोतलों वाली पुरानी व्यवस्था को बहाल करती है या फिर अगले साल से प्रदेश में प्लास्टिक की बोतलों का दौर शुरू होगा।



