
Chhattisgarh First Festival Hareli Tihar 2026 Date: कृषि प्रधान राज्य छत्तीसगढ़ में यूं तो साल भर कई पर्व और त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन यहां के किसानों के लिए ‘हरेली तिहार’ का स्थान सबसे खास है। इसे छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार माना जाता है। धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध इस राज्य में, धान की बुवाई का काम पूरा होने के बाद इस पर्व को पूरे उल्लास और परंपरा के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से खेतों की हरियाली, कृषि उपकरणों और प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करने का अवसर होता है।

हरेली तिहार 2026 की सही तिथि और मुहूर्त
Kab Hai Hareli Tihar 2026: छत्तीसगढ़ का यह प्रसिद्ध लोकपर्व हर साल सावन महीने की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में सावन अमावस्या की शुरुआत 12 अगस्त दिन बुधवार की सुबह 01 बजकर 55 मिनट पर होगी और इसका समापन उसी दिन रात 11 बजकर 06 मिनट पर होगा। उदया तिथि और अमावस्या के संयोग के कारण इस साल हरेली तिहार 12 अगस्त 2026 को पूरे प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाएगा।

हरेली शब्द का अर्थ और इसकी उत्पत्ति
Meaning of Hareli: ‘हरेली’ शब्द मूल रूप से छत्तीसगढ़ी बोली का शब्द है, जिसका सीधा अर्थ ‘हरियाली’ से जुड़ा है। यह शब्द ‘हरा’ या ‘हरियर’ से निकला है, जो पौधों की ताजगी, खेतों में लहलहाती फसलों और प्रकृति के हरे-भरे रूप का प्रतीक है। इस पर्व का नाम ही यह स्पष्ट करता है कि यह त्योहार प्रकृति के सम्मान और खेतों की हरियाली का उत्सव है, जिसके जरिए किसान अच्छी फसल के लिए प्रकृति का धन्यवाद करते हैं।

हरेली तिहार मनाने की पारंपरिक विधि
Hareli Tihar 2026 Date: सावन के महीने में जब धान की रोपाई का काम लगभग पूरा हो जाता है, तब किसान इस त्योहार को मनाते हैं। इस दिन सुबह उठकर किसान अपने कृषि उपकरणों जैसे हल, कुदाल और फावड़े की अच्छी तरह से साफ-सफाई करते हैं। इसके बाद इन औजारों की पूजा की जाती है। घरों में कुलदेवी की आराधना होती है, जिसमें उन्हें अक्षत, धूप, दीप और मीठे व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। यह पूजा खेतों और घरों दोनों जगह पूरी आस्था के साथ संपन्न होती है।

चीला का भोग और पशुधन का सम्मान
हरेली के दिन छत्तीसगढ़ के घरों में मुख्य रूप से ‘चीला’ (चावल के आटे से बना एक पारंपरिक व्यंजन) बनाया जाता है। सबसे पहले इसे कृषि औजारों पर चढ़ाकर पूजा की जाती है, और फिर इसे परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इसके अलावा, गाय, बैल और भैंस जैसे पालतू जानवरों को नहला-धुलाकर सजाया जाता है और उन्हें भी चीला खिलाया जाता है। मान्यता है कि इससे पशु स्वस्थ रहते हैं और उन्हें किसी प्रकार की बीमारी नहीं होती।

नीम की टहनियां और बीमारियों से बचाव
इस दिन पर्यावरण सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी एक खास परंपरा निभाई जाती है। हरेली के दिन लोग अपने घरों के दरवाजों पर नीम की टहनियां लगाते हैं। ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से बरसात के मौसम में पनपने वाले कीड़े-मकोड़े और हानिकारक बैक्टीरिया घर के अंदर प्रवेश नहीं करते हैं। इसे घर को नकारात्मक ऊर्जा और मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रखने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है।

गेंड़ी चढ़ने की अनूठी और रोमांचक परंपरा
हरेली तिहार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘गेंड़ी’ है। इस दिन बांस की लकड़ियों का उपयोग करके गेंड़ी बनाई जाती है। गांव के बच्चे और युवा 20 से 25 फीट ऊंची गेंड़ी पर चढ़कर संतुलन बनाते हुए पूरे गांव में घूमते हैं। कई गांवों में गेंड़ी दौड़ की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। यह खेल शारीरिक संतुलन और ग्रामीण युवाओं के उत्साह को प्रदर्शित करता है, जो आज भी गांवों में काफी लोकप्रिय है।

क्यों मनाया जाता है हरेली तिहार?
इस त्योहार को मनाने का मुख्य उद्देश्य अच्छी फसल की कामना करना और हानिकारक कीटों से बचाव करना है। किसान अपने खेतों में जाकर विशेष पूजा करते हैं ताकि उनकी धान की फसल निरोगी रहे। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से पर्यावरण शुद्ध रहता है और खेतों में धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होता है, जिससे घर-परिवार में कभी भी अन्न और धन की कोई कमी नहीं होती।

हरेली के लोकगीत और लोक वाद्ययंत्र
हरेली तिहार के मौके पर गांवों में पारंपरिक लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है। महिलाएं और बच्चे समूह में बैठकर खेतों या आंगन में गीत गाते हैं, जिनमें कृषि, बैल, हरियाली और ग्रामीण जीवन की झलक होती है। “हरेली के दिन आय रे, किसान मन के मन हरसाय…” जैसे गीत इस दिन बहुत गाए जाते हैं। गीतों के साथ ढोलक, मंजीरा और नगाड़ा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, जो इस त्योहार के उल्लास को कई गुना बढ़ा देते हैं।




