
बस्तर में नक्सल गतिविधियों के कम होने से विकास कार्यों की गति बढ़ी है। सरकार को उम्मीद है कि अब क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं का दायरा और मजबूत हो सकेगा। सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के संकेत दिख रहे हैं, लेकिन कुपोषण का सवाल अभी भी वहीं का वहीं है। सरकार ने नयद नेल्लानार यानी मेरा बेहतर गांव जैसी योजनाएं लागू की हैं, जिन पर बड़ा बजट खर्च हो रहा है। इसके बावजूद कुपोषण में वह गिरावट नहीं आई जिसकी उम्मीद थी। लगभग 150 करोड़ रुपये के खर्च के बाद भी हालात में संतोषजनक सुधार नहीं दिखा है।
कुपोषण का कलंक मिटाने की कोशिश
सरकार बस्तर के लिए नया मेगा प्लान तैयार कर रही है। एक साल की समीक्षा रिपोर्ट में सामने आया कि सरकारी प्रयासों का असर जिलों में बहुत सीमित रहा। बस्तर अब भी राज्य का सबसे ज्यादा कुपोषित इलाका है। कई जिलों में कुपोषण की दर 15 से 32 फीसदी के बीच दर्ज की गई। वहीं राज्य के कुछ दूसरे जिलों में यह आंकड़ा 6 से 10 फीसदी तक है। सरकार अब कुपोषण को सबसे बड़ी चुनौती मानकर नई रणनीति बनाने में जुटी है।
जिलेवार कुपोषण की स्थिति
बस्तर और आसपास के जिलों में कुपोषण की स्थिति इस तरह है:
बस्तर
2024 में 15.67 फीसदी
2025 में 15.89 फीसदी
बीजापुर
2024 में 23.39 फीसदी
2025 में 23.58 फीसदी
दंतेवाड़ा
2024 में 25.28 फीसदी
2025 में 23.54 फीसदी
कांकेर
2024 में 15.69 फीसदी
2025 में 15.49 फीसदी
कोंडागांव
2024 में 17.51 फीसदी
2025 में 16.54 फीसदी
नारायणपुर
2024 में 25.41 फीसदी
2025 में 25.27 फीसदी
सुकमा
2024 में 32.01 फीसदी
2025 में 31.95 फीसदी
इन आंकड़ों से साफ है कि कुछ जिलों में मामूली सुधार दिखा, लेकिन समग्र रूप से स्थिति गंभीर बनी हुई है।
कुपोषण पर सरकारी खर्च
बीते तीन वर्षों में कुपोषण से निपटने के लिए कई योजनाओं में बड़ा बजट खर्च किया गया, जो इस प्रकार है:
मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना
2022-23 में 80 लाख रुपये
2023-24 में 76 लाख रुपये
2024-25 में 23 लाख रुपये
पोषण अभियान
2022-23 में 54 लाख रुपये
2023-24 में 8 करोड़ रुपये
2024-25 में 7 करोड़ रुपये
पूरक पोषण आहार
2022-23 में 30 करोड़ रुपये
2023-24 में 29 करोड़ रुपये
2024-25 में 20 करोड़ रुपये
मुख्यमंत्री सुपोषण योजना
2022-23 में 27 करोड़ रुपये
2023-24 में 27 करोड़ रुपये
2024-25 में 10 करोड़ रुपये
खर्च भले बढ़ा हो, लेकिन जमीन पर उसका असर सीमित दिखाई देता है। कई अभियानों में लापरवाही के मामले सामने आए हैं। दस्तक अभियान की कमजोर निगरानी की वजह से कई बच्चों की हालत बिगड़ने के मामले भी दर्ज किए गए।
जहां स्थिति बेहतर है
राज्य के कई जिलों में कुपोषण का स्तर काफी कम है। इन जिलों में बेहतर पोषण सेवाओं और नियमित निगरानी का असर दिखता है।
दुर्ग में कुपोषण 6.67 फीसदी, धमतरी में 8.07 फीसदी, मुंगेली में 8.14 फीसदी और सारंगढ़ में 8.75 फीसदी है। जांजगीर में 8.75 फीसदी, सक्ती में 9.27 फीसदी, बिलासपुर में 9.39 फीसदी, कोरबा में 10.31 फीसदी, सूरजपुर में 10.78 फीसदी और रायपुर में 13.82 फीसदी कुपोषण दर्ज किया गया।
आगे की राह
बस्तर में लाल आतंक घटने से विकास के लिए नई संभावनाएं बनी हैं, लेकिन कुपोषण सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। सरकार अब क्षेत्र के लिए नई कार्ययोजना बना रही है, ताकि बच्चों और माताओं की पोषण स्थिति में तेज सुधार किया जा सके। उम्मीद है कि बेहतर निगरानी और समय पर पोषण सेवाओं से आने वाले वर्षों में यह कलंक भी कम होगा।
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