बैलाडीला की पहाड़ियों में है लोहे का खजाना: केंद्र ने दी खनन विस्तार को हरी झंडी, आदिवासियों ने शुरू किया आर-पार का विरोध

दंतेवाड़ा: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थित बैलाडीला की पहाड़ियों से अब और अधिक लौह अयस्क निकाला जा सकेगा। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने दंतेवाड़ा जिले के इस वन क्षेत्र में खनन विस्तार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के तहत नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NMDC) को 874.924 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग की अनुमति मिल गई है। अब एनएमडीसी का वार्षिक उत्पादन 11.30 मिलियन टन से बढ़कर 14.50 मिलियन टन प्रति वर्ष हो जाएगा। इसके अलावा वेस्ट उत्खनन की क्षमता में भी भारी बढ़ोतरी की गई है। सरकार के इस कदम से खनन प्रक्रिया में तेजी आएगी लेकिन स्थानीय स्तर पर इसके प्रति नाराजगी भी बढ़ गई है।

हजारों साल पुराने पेड़ों और जल स्रोतों पर संकट: स्थानीय आदिवासियों ने खोला मोर्चा, बोले- तबाह हो जाएगा हमारा जंगल

केंद्र सरकार के इस फैसले का स्थानीय आदिवासी समुदाय और विभिन्न सामाजिक संगठन कड़ा विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि खनन विस्तार से बैलाडीला के प्राचीन जंगलों, दुर्लभ वन्यजीवों और स्थानीय नदी-नालों को अपूरणीय क्षति होगी। 5 जनवरी से दंतेवाड़ा में युवाओं और राजनीतिक दलों ने नए सिरे से आंदोलन छेड़ दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मशीनों की खुदाई से पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा। आदिवासियों के लिए ये पहाड़ केवल संसाधन नहीं बल्कि उनकी आस्था का केंद्र भी हैं। जल स्रोतों के सूखने और हजारों साल पुराने पेड़ों की कटाई की आशंका ने इस विरोध प्रदर्शन को और भी उग्र बना दिया है।

बैलाडीला में है लोहे का खजाना: 558 मिलियन टन से ज्यादा का भंडार

बैलाडीला की पहाड़ियां अपनी खास बनावट के लिए जानी जाती हैं। बैल के कूबड़ जैसी दिखने वाली इन पर्वत चोटियों में उच्च गुणवत्ता वाले हेमेटाइट लोहे का विशाल भंडार है। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों के मुताबिक इस पूरे क्षेत्र में लगभग 558.84 मिलियन टन लोहे का भंडार मौजूद है। इनमें से 351.32 मिलियन टन लोहे को तकनीकी रूप से खनन के योग्य माना गया है। यही वजह है कि केंद्र सरकार और एनएमडीसी इस क्षेत्र में अपनी उत्पादन क्षमता को लगातार बढ़ाना चाहते हैं। हालांकि, यह इलाका आरक्षित वन क्षेत्र होने के कारण पर्यावरणीय नियमों के घेरे में रहता है, जिससे विकास और पर्यावरण के बीच का टकराव अक्सर सामने आता रहता है।

2037 तक की है वन स्वीकृति: मार्च 2020 में मिली थी शुरुआती क्लीयरेंस, एनएमडीसी के पास अब कानूनी तौर पर रास्ता साफ

एनएमडीसी को इस भूमि के लिए वन स्वीकृति यानी फॉरेस्ट क्लीयरेंस काफी समय पहले ही मिल चुकी थी। मार्च 2020 में मिली यह स्वीकृति 17 वर्षों के लिए वैध है, जो सितंबर 2037 तक प्रभावी रहेगी। हालिया बैठक में पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने और वेस्ट मैनेजमेंट के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगाई है। कानूनी रूप से कंपनी के पास खनन के लिए रास्ता साफ है, लेकिन जमीनी स्तर पर जनता का भरोसा जीतना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। पुराने आदेशों की वैधता के आधार पर ही एनएमडीसी अपनी परियोजनाओं को विस्तार देने की तैयारी में जुटी है।

क्या विकास के आगे झुक जाएगा पर्यावरण: बस्तर में फिर छिड़ी जल-जंगल-जमीन की जंग, आगे और तेज हो सकता है आंदोलन

बैलाडीला में खनन की इस मंजूरी ने छत्तीसगढ़ में ‘जल-जंगल-जमीन’ की बहस को एक बार फिर गरमा दिया है। एक तरफ जहां सरकार और कंपनी देश की अर्थव्यवस्था में लोहे के योगदान और राजस्व की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता अपने अस्तित्व को बचाने की गुहार लगा रही है। आने वाले दिनों में यह विरोध प्रदर्शन और भी उग्र रूप ले सकता है क्योंकि कई राजनीतिक दलों ने भी आदिवासियों के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस विरोध को कैसे शांत करती है और विकास के इस पहिए को पर्यावरण की कीमत चुकाए बिना कैसे आगे बढ़ाया जाता है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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