
Dantewada Heritage Historical Discoveries: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले से भारतीय इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए एक बहुत बड़ी और अच्छी खबर आई है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे ज्ञानभारतम् मिशन के तहत दंतेवाड़ा की धरती से प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरें मिली हैं। जिले के अलग-अलग हिस्सों में किए गए व्यापक जमीनी सर्वे के दौरान कई महत्वपूर्ण प्राचीन शिलालेख और सदियों पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गई हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये नई खोजें बस्तर क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन लिपियों के चलन और भारतीय ज्ञान परंपरा को पूरी दुनिया के सामने एक नए रूप में स्थापित करने का काम करेंगी।
प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने दी बधाई, बोले- आने वाली पीढ़ियों को अपनी ऐतिहासिक जड़ों को समझने का मिलेगा मौका
इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कामयाबी पर वन एवं जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने खुशी जाहिर की है। उन्होंने दंतेवाड़ा जिला प्रशासन और सर्वे में जुटी पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह बस्तर के गौरवशाली अतीत को सहेजने की दिशा में उठाया गया एक बहुत बड़ा कदम है। इस मिशन की सफलता से क्षेत्र के छिपे हुए ऐतिहासिक तथ्य उजागर होंगे। इसके साथ ही आज की आधुनिक पीढ़ी और आने वाले युवाओं को बस्तर की प्राचीन लोक संस्कृति, कला और अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक जड़ों को बेहद करीब से और गहराई से समझने का एक नया अवसर हासिल होगा।
कलेक्टर के निर्देशन में शिक्षकों और अफसरों की विशेष टीम कर रही है धार्मिक स्थलों का गहन सर्वे
दंतेवाड़ा के कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव की देखरेख में जिले के भीतर इस राष्ट्रीय मिशन पर जमीनी स्तर पर तेजी से काम किया जा रहा है। इस पूरी मुहिम को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिला नोडल अधिकारी और अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) के नेतृत्व में एक विशेष कार्यदल बनाया गया है। इस दल में खास तौर पर प्रशिक्षित मास्टर ट्रेनर्स, विकासखंड स्तरीय नोडल अधिकारी और संकुल स्तर के स्थानीय शिक्षकों को शामिल किया गया है। यह पूरी टीम लगातार अंदरूनी ग्रामीण क्षेत्रों, प्राचीन टीलों, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों का दौरा कर गहन तकनीकी सर्वेक्षण कर रही है।
समलूर के प्राचीन शिव मंदिर में मिला 11वीं शताब्दी का दुर्लभ तेलुगु और देवनागरी शिलालेख
इस सर्वेक्षण दल को अब तक के शुरुआती चरण में कुल 5 प्राचीन शिलालेख और 2 अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पांडुलिपियां हासिल हो चुकी हैं। इसमें सबसे प्रमुख सफलता समलूर के ऐतिहासिक शिव मंदिर में मिली है। यहां से शोधकर्ताओं को 11वीं शताब्दी के कालखंड का एक बेहद दुर्लभ तेलुगु शिलालेख और उसी दौर का एक अन्य देवनागरी शिलालेख प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही इसी प्राचीन मंदिर के परिसर से खोजकर्ताओं को 18वीं से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य की अवधि में देवनागरी लिपि के भीतर हाथ से लिखी गई एक अत्यंत प्राचीन पांडुलिपि भी मिली है।
बारसूर के ऐतिहासिक मामा-भांजा मंदिर और दंतेश्वरी मंदिर में भी मिले कई सौ साल पुराने प्रमाण
ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से पूरे देश में मशहूर बारसूर के मामा-भांजा मंदिर से भी एक बड़ा प्रमाण मिला है। यहां किए गए सर्वे में 1060 से 1068 ईस्वी के कालखंड का एक प्राचीन और बेहद महत्वपूर्ण तेलुगु शिलालेख पाया गया है जो उस दौर के राजाओं के शासनकाल पर रोशनी डालता है। इसके अलावा दंतेवाड़ा स्थित सुप्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर परिसर की जांच के दौरान 13वीं शताब्दी के शुरुआती दौर के दो अलग-अलग शिलालेख मिले हैं। इन दोनों शिलालेखों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें तेलुगु और देवनागरी, दोनों ही लिपियों का एक साथ मिला-जुला प्रयोग किया गया है।
आंवराभाटा क्षेत्र में मिली उड़िया लिपि की ताड़पत्र पांडुलिपि, प्राचीन काल में ज्ञान का केंद्र था बस्तर
खोज की इस कड़ी में जिले के आंवराभाटा क्षेत्र से एक और अनोखी सफलता हाथ लगी है। यहां से टीम को एक प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपि मिली है। शुरुआती वैज्ञानिक आकलनों के आधार पर यह पांडुलिपि करीब 150 से 300 साल पुरानी बताई जा रही है और इसे लिखने में ओडिया लिपि का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। पुरातत्व के जानकारों के मुताबिक ये तमाम नए दस्तावेज और साक्ष्य इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि बस्तर का यह पूरा वनांचल क्षेत्र प्राचीन समय से ही विभिन्न भाषाओं, लिपियों, संस्कृति, उन्नत ज्ञान और आध्यात्मिक परंपराओं का एक बड़ा वैश्विक केंद्र रहा है।
वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया शुरू, इतिहास को सहेजने में जुटा जिला प्रशासन
वर्तमान में दंतेवाड़ा जिला प्रशासन इन सभी प्राचीन और बहुमूल्य ऐतिहासिक संपत्तियों को सुरक्षित रखने की कवायद में जुट गया है। इन सभी शिलालेखों और पांडुलिपियों के वैज्ञानिक संरक्षण, दस्तावेजीकरण और भावी पीढ़ी के लिए इनके डिजिटलाइजेशन (डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने) की आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाएं तेजी से पूरी की जा रही हैं। इसके साथ ही इन लिपियों के भीतर छिपे संदेशों को पूरी तरह डिकोड करने के लिए आगे के गहन अध्ययन की तैयारी भी की जा रही है। ज्ञानभारतम् मिशन के इन प्रयासों से दंतेवाड़ा का यह छिपा हुआ इतिहास अब बहुत जल्द पूरी दुनिया के सामने खुलकर आएगा।



