
Dhamtari Rath Yatra Jagdish Temple: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित प्राचीन जगदीश मंदिर में इस साल भी रथयात्रा महापर्व को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। मठमंदिर चौक पर स्थित इस ऐतिहासिक मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां पिछले 107 वर्षों से लोगों की अगाध आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। इस प्राचीन मंदिर का इतिहास बेहद दिलचस्प है और इससे कई लोक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। रथयात्रा उत्सव की शुरुआत के साथ ही मंदिर में पारंपरिक अनुष्ठानों का दौर भी शुरू हो गया है।
107 साल पुराना इतिहास
Dhamtari Jagdish Temple History:इतिहास के जानकारों और मंदिर के दस्तावेजों के अनुसार इन दिव्य मूर्तियों का निर्माण साल 1918 में कराया गया था। ओडिशा के मशहूर मूर्तिकार देवीप्रसाद चित्रकार और उनके भाई बालमुकुंद ने इन प्रतिमाओं को रूप दिया था। इन्हें बनाने के लिए विशेष रूप से महानीम की लकड़ियों की शाखाओं का उपयोग किया गया था। इन प्रतिमाओं को पूरी तरह तैयार करने में उस समय के कलाकारों को करीब ढाई महीने का लंबा समय लगा था। वर्तमान में उसी शिल्पी परिवार की चौथी पीढ़ी इन मूर्तियों की देखरेख की जिम्मेदारी संभाल रही है।

पवित्र जल से महास्नान
Dhamtari Rath Yatra 2026: रथयात्रा के तय कार्यक्रम के अनुसार 8 जुलाई को सुबह भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को पवित्र नदियों के जल से स्नान कराया गया। इस महास्नान के लिए गंगा, यमुना, गोदावरी और महानदी समेत सात पवित्र नदियों और समुद्र का जल मंगाया गया था। मुख्य पुरोहित बालकृष्ण शर्मा ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मूर्तियों को दूध, दही, केसर, पंचामृत और गुलाब की पंखुड़ियों से स्नान कराया। इस विशेष पूजा और महास्नान को देखने के लिए मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ जुटी रही।
बीमार हुए महाप्रभु
धार्मिक मान्यताओं और परंपरा के अनुसार इस बड़े महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं। अत्यधिक स्नान के कारण उनके अस्वस्थ होने की यह परंपरा सदियों पुरानी है। इसी वजह से 11 जुलाई से अगले चार दिनों तक भगवान को एकांत कक्ष में रखा जाएगा और उनका इलाज चलेगा। इस दौरान मंदिर के मुख्य कपाट आम जनता और दर्शनार्थियों के लिए पूरी तरह बंद रहेंगे। इस गुप्त अनुष्ठान के समय केवल मंदिर के मुख्य पुजारी ही भगवान की सेवा के लिए गर्भगृह में जा सकेंगे।
बंटेगा विशेष काढ़ा
भगवान जगन्नाथ के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए उन्हें विशेष जड़ी-बूटियों से तैयार औषधीय काढ़े का भोग लगाया जाएगा। यह औषधीय उपचार 11 जुलाई से शुरू होकर 14 जुलाई तक लगातार चलेगा। मंदिर समिति के सदस्यों ने बताया कि भगवान को भोग लगाने के बाद इस विशेष काढ़े को प्रसाद के रूप में आम जनता को भी बांटा जाएगा। 14 जुलाई तक हर दिन सुबह साढ़े सात बजे मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को यह काढ़ा दिया जाएगा, जिसे सेहत के लिए बहुत पवित्र माना जाता है।
15 जुलाई को नेत्रोत्सव
चार दिनों के उपचार और आराम के बाद महाप्रभु पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगे। आगामी 15 जुलाई को सुबह साढ़े नौ बजे विशेष हवन और पूजन का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद मूर्तियों की दोबारा प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। इसी दिन को नेत्रोत्सव कहा जाता है और भगवान नए रूप यानी नवकलेवर में अपने भक्तों को दर्शन देंगे। मंदिर ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया कि इस पावन अवसर पर शहर के सभी प्रमुख नागरिक और बड़ी संख्या में बाहरी क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु उपस्थित रहेंगे।
अंग्रेज टीटीई का किस्सा
मंदिर के मुख्य पुजारी ने साल 1918 का एक बेहद चमत्कारी और ऐतिहासिक संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि जब धमतरी के स्थानीय भक्त इन मूर्तियों को पहली बार पुरी से ट्रेन के जरिए ला रहे थे, तब अभनपुर स्टेशन के पास एक ब्रिटिश टीटीई ने मूर्तियों के बक्से पर अपनी लाठी मार दी थी। इस घटना के तुरंत बाद ट्रेन के दो डिब्बे अचानक पटरी से नीचे उतर गए, लेकिन जिस डिब्बे में भगवान की मूर्तियां रखी थीं, उसे खरोंच तक नहीं आई। इस घटना को देखकर वह अंग्रेज अफसर डर गया और उसने अपनी गलती मानकर माफी मांगी। इसके बाद वह खुद आदरपूर्वक उन मूर्तियों को धमतरी तक छोड़कर गया था।
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