
Digital CG BharatNet Project: छत्तीसगढ़ को डिजिटल बनाने के नाम पर एक बार फिर भारी-भरकम बजट जारी हुआ है। केंद्र सरकार ने एडवांस भारतनेट प्रोग्राम के तहत राज्य को 3,942 करोड़ रुपये की नई किस्त मंजूर की है। इस भारी निवेश का लक्ष्य प्रदेश की 11,682 ग्राम पंचायतों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाना है। हालांकि, सरकारी दावों के बीच एक कड़वा सच यह भी है कि साल 2018 से अब तक करीब 3,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी “नो सिग्नल” पर टिकी है। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के 19,567 गांवों में से लगभग 1,200 गांव आज भी डिजिटल इंडिया की पहुंच से कोसों दूर हैं।
4 हजार करोड़ की नई संजीवनी: क्या इस बार बदलेगी तस्वीर?
केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में छत्तीसगढ़ के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए करीब 4 हजार करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। इस राशि का उपयोग ऑप्टिकल फाइबर बिछाने और कनेक्टिविटी से वंचित क्षेत्रों में नेटवर्क पहुंचाने के लिए किया जाना है। प्रशासन का दावा है कि इस बजट से वनांचल क्षेत्रों में इंटरनेट की क्रांति आएगी। लेकिन सवाल वही पुराना है कि क्या यह नई राशि भी पिछली परियोजनाओं की तरह फाइलों में ही दफन हो जाएगी या सच में बस्तर और सरगुजा के आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति को हाई-स्पीड डेटा मिल पाएगा?
जमीन से 1.65 मीटर नीचे बिछाया गया जाल, पर केबल ही गायब
भारतनेट के पहले चरण में 5,987 पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ने का लक्ष्य था। योजना के अनुसार, जमीन से 1.65 मीटर नीचे खास तरह के 48 कोर वायर बिछाए जाने थे, ताकि प्राकृतिक आपदा में भी संपर्क न टूटे। दावे किए गए थे कि ये केबल दशकों तक सुरक्षित रहेंगे। लेकिन आज स्थिति यह है कि बस्तर जैसे संवेदनशील इलाकों में बिछाए गए केबल कई जगहों से गायब हो चुके हैं। बुनियादी ढांचे की इस बदहाली ने सरकारी दावों और करोड़ों के खर्च पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
बस्तर और सरगुजा के वनांचल में आज भी मोबाइल नेटवर्क एक सपना
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में हालात आज भी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे संभागों में मोबाइल टावर तो लगे हैं, लेकिन वे अक्सर शो-पीस बनकर रह जाते हैं। कई गांवों में आज भी एक साधारण फोन कॉल करने के लिए लोगों को ऊंचे पहाड़ों या पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। साल 2018 में शुरू किए गए ‘बस्तर नेट’ जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों का शोर तो बहुत हुआ, लेकिन धरातल पर कनेक्टिविटी आज भी एक विलासिता बनी हुई है।
राशन से लेकर पढ़ाई तक, नेटवर्क न होने से जनता बेहाल
आज सरकार की लगभग सभी जनहितकारी योजनाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो चुकी हैं। राशन वितरण (PDS), पेंशन, छात्रवृत्ति और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इंटरनेट अनिवार्य है। लेकिन नेटवर्क के अभाव में गांव की राशन दुकानों पर अक्सर ‘सर्वर डाउन’ की तख्ती लटकी रहती है। इससे गरीब परिवारों को राशन के लिए कई दिनों तक भटकना पड़ता है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र ऑनलाइन पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं के दौर में शहर के बच्चों से पिछड़ रहे हैं, क्योंकि उनके पास स्थिर इंटरनेट कनेक्शन नहीं है।
जवाबदेही की कमी और अधूरी परियोजनाओं का अंबार
सदन में भी डिजिटल कनेक्टिविटी को लेकर कई बार तीखे सवाल उठ चुके हैं। पिछली सरकारों और वर्तमान प्रशासन के बीच योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर खींचतान जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बजट जारी करना काफी नहीं है, बल्कि पिछली राशि का ऑडिट होना और दोषियों की जवाबदेही तय होना जरूरी है। अगर पुरानी अधूरी परियोजनाओं को पूरा किए बिना नई राशि खर्च की गई, तो यह सरकारी खजाने की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं होगा।
डिजिटल छत्तीसगढ़ के लिए अब क्या है जरूरी?
डिजिटल छत्तीसगढ़ का सपना तभी साकार होगा जब केवल कागजों पर पंचायतों को ‘कनेक्टेड’ न दिखाया जाए, बल्कि वहां सक्रिय इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध हों। इसके लिए स्थानीय स्तर पर तकनीकी मेंटेनेंस की टीम, मोबाइल टावरों की संख्या में बढ़ोतरी और फाइबर नेटवर्क की नियमित निगरानी आवश्यक है। जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं है; उसे वह नेटवर्क चाहिए जिससे उसकी पेंशन, राशन और बच्चों की शिक्षा बिना किसी ‘बफरिंग’ के चलती रहे।



