
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से शिक्षा विभाग का एक ऐसा कारनामा सामने आया है जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। मिडिल स्कूल लिमगांव में प्रभारी प्रधान पाठक ने स्कूल आने के बजाय अपनी जगह एक बाहरी युवक को पढ़ाने के लिए रख लिया और उसे महीने के 6500 रुपये थमा दिए। खुद प्रधान पाठक बिना स्कूल कदम रखे सरकारी खजाने से पूरा वेतन उठाते रहे। इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब एक स्थानीय शिकायतकर्ता ने इसकी परतें खोलीं। जांच रिपोर्ट में न केवल शिक्षक बल्कि संकुल समन्वयक से लेकर खंड शिक्षा अधिकारी तक के शामिल होने की बात सामने आई है।
6500 रुपये का ‘प्राइवेट मास्टर’: सरकारी स्कूल में चल रहा था आउटसोर्सिंग का खेल
जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि प्रभारी प्रधान पाठक धनीराम चौधरी लकवाग्रस्त होने के कारण स्कूल आने में असमर्थ थे। अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय उन्होंने जितेंद्र साहू नाम के एक बाहरी युवक को 6500 रुपये के मासिक वेतन पर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का ‘ठेका’ दे दिया। हैरानी की बात यह है कि महीनों तक यह खेल चलता रहा और विभागीय अधिकारियों ने इस ओर से आंखें मूंद रखी थीं। ग्रामीण और बच्चे भी इस बात से अनजान थे कि जो व्यक्ति उन्हें पढ़ा रहा है वह सरकारी शिक्षक है ही नहीं।
बयान से पलटे अधिकारी: पंचनामा में कबूली बात लेकिन जांच के दौरान मुकरे
इस मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब संकुल प्रभारी ठंडाराम टिकूलिया और समन्वयक गिरधारी लाल पटेल जैसे जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने बयानों से पलटना शुरू कर दिया। अगस्त 2023 में बनाए गए एक पंचनामा में इन लोगों ने स्वीकार किया था कि प्रधान पाठक की तबीयत खराब होने के कारण बाहरी व्यक्ति से काम कराया जा रहा है। लेकिन जब आधिकारिक जांच टीम पहुंची, तो इन सभी ने अपने पुराने बयानों से इनकार कर दिया। जांच दल ने इसे तथ्यों को छिपाने की कोशिश माना और इन अधिकारियों को भी दोषी करार दिया है।
बीईओ कार्यालय की भूमिका संदिग्ध: दो साल पहले सूचना मिलने पर भी नहीं हुई कार्रवाई
जांच रिपोर्ट में सरायपाली बीईओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। खुलासा हुआ है कि प्रधान पाठक की शारीरिक स्थिति और स्कूल न आने की जानकारी अगस्त 2022 में ही कार्यालय को दे दी गई थी। इसके बावजूद तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। न तो प्रधान पाठक की उपस्थिति की जांच की गई और न ही ऑनलाइन हाजिरी के दस्तावेजों का मिलान किया गया। यह लापरवाही दर्शाती है कि निचले स्तर पर चल रहे इस फर्जीवाड़े को ऊपर से मूक सहमति मिली हुई थी।
दस्तावेजों के साथ जालसाजी: प्रधान पाठक के फर्जी हस्ताक्षर कर बांटी गई टीसी और मार्कशीट
स्कूल के अन्य शिक्षकों ने भी इस गड़बड़झाले में पूरा साथ दिया। जांच में पाया गया कि शिक्षक मनीष साहू और दिनेश पटेल ने स्कूल के महत्वपूर्ण रजिस्टरों, दाखिला-खारीज और बच्चों की प्रगति रिपोर्ट पर खुद प्रधान पाठक के नाम के हस्ताक्षर किए। बिना किसी लिखित अनुमति के एक शिक्षक के स्थान पर दूसरे द्वारा हस्ताक्षर करना कानूनन अपराध है। इन फर्जी हस्ताक्षरों के जरिए टीसी और परीक्षा परिणाम तक जारी कर दिए गए, जिससे सैकड़ों बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होने का खतरा पैदा हो गया है।
उच्च अधिकारियों पर भी गिरी गाज: एबीईओ की कार्यशैली को माना गया गैर-जिम्मेदाराना
मामले की आंच सहायक खंड शिक्षा अधिकारियों (एबीईओ) तक भी पहुंची है। एबीईओ डी.एन. दीवान और तत्कालीन अधिकारी जितेंद्र रावल ने जांच टीम को बताया कि उन्होंने पंचनामा पर बिना पढ़े ही हस्ताक्षर कर दिए थे क्योंकि वहां एसडीएम मौजूद थे। जांच रिपोर्ट में इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा बिना पढ़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना नियमों का उल्लंघन है और यह उनकी मिलीभगत को दर्शाता है।
जांच रिपोर्ट से हड़कंप: जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपी गई अंतिम रिपोर्ट
शिकायतकर्ता विनोद कुमार दास की लगातार शिकायतों के बाद गठित चार सदस्यीय जांच टीम ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) विजय कुमार लहरे को सौंप दी है। रिपोर्ट में स्कूल से लेकर संकुल और ब्लॉक स्तर के आधा दर्जन से अधिक कर्मियों को दोषी पाया गया है। डीईओ ने पुष्टि की है कि रिपोर्ट प्राप्त हो गई है और इसमें शामिल सभी दोषियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए फाइल को उच्च कार्यालय भेजा जा रहा है। इस खुलासे के बाद जिले के अन्य स्कूलों की निगरानी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
भ्रष्टाचार का मॉडल: क्या केवल लिमगांव ही है या अन्य स्कूलों में भी है यही हाल?
यह मामला केवल एक स्कूल की अनियमितता नहीं बल्कि शिक्षा विभाग की निगरानी प्रणाली की विफलता को उजागर करता है। प्रधान पाठक का वेतन जारी होता रहा लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि वह व्यक्ति स्कूल आ भी रहा है या नहीं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते शिकायत नहीं होती, तो यह ‘प्राइवेट ठेका’ व्यवस्था सालों तक चलती रहती। अब मांग उठ रही है कि जिले के अन्य दूरस्थ स्कूलों की भी औचक जांच की जाए ताकि पता चल सके कि कहीं वहां भी तो शिक्षकों ने अपनी जगह ‘भाड़े के मास्टर’ नहीं रख रखे हैं।
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