Hasdeo Aranya Coal Block Forest Clearance Protest: हसदेव में 7 लाख पेड़ों पर चलेगी कुल्हाड़ी: नए कोल ब्लॉक के प्रस्ताव पर भड़का ‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’, रेगिस्तान बनने की चेतावनी

Hasdeo Aranya Coal Block: छत्तीसगढ़ के फेफड़े कहे जाने वाले हसदेव अरण्य के जंगलों पर एक बार फिर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। नए कोल ब्लॉक को मंजूरी देने के प्रस्ताव ने पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय निवासियों की चिंता बढ़ा दी है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन (CBA) और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस फैसले का पुरजोर विरोध किया है। संगठनों का आरोप है कि राजस्थान की बिजली जरूरतों का बहाना बनाकर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए राज्य के भविष्य को दांव पर लगाया जा रहा है।

केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को मंजूरी देने की तैयारी

आंदोलन से जुड़े नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति 8 मई को होने वाली अपनी बैठक में केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को वन स्वीकृति देने पर विचार कर सकती है। चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य सरकार ने इसके लिए पहले ही अपनी सिफारिश भेज दी है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस नए प्रोजेक्ट के लिए लगभग 7 लाख पेड़ों को काटना होगा, जो प्रदेश के पर्यावरण और जैव विविधता के लिए एक आत्मघाती कदम साबित हो सकता है।

बांगो जलाशय और सिंचाई व्यवस्था पर गहराएगा संकट

हसदेव अरण्य में होने वाली इस बड़ी कटाई का सीधा असर हसदेव नदी और बांगो जलाशय पर पड़ने की आशंका है। यह जलाशय छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था की रीढ़ है जिससे लाखों हेक्टेयर खेतों की सिंचाई होती है। अगर जंगल खत्म होते हैं तो नदी का जलस्तर गिरेगा और जलाशय सूखने की कगार पर पहुंच सकता है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होगा, बल्कि प्रदेश में एक बड़ा कृषि संकट भी खड़ा हो सकता है।

10 हजार एकड़ जंगल पहले ही हो चुका है तबाह

आंदोलनकारियों ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि हसदेव क्षेत्र में पहले से चल रही परसा ईस्ट केते बासेन और अन्य खदानों की वजह से 10,000 एकड़ से ज्यादा घना जंगल पहले ही उजाड़ा जा चुका है। अब तक लगभग 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। नए कोल ब्लॉक की मंजूरी मिलने से यह नुकसान दोगुना हो जाएगा। बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इतनी बड़ी संख्या में वनों की कटाई छत्तीसगढ़ को रेगिस्तान बनाने की ओर एक कदम होगा।

आदिवासियों की आजीविका और संस्कृति पर सीधा प्रहार

प्रस्तावित खदान क्षेत्र का 98 प्रतिशत हिस्सा घने वनों से ढका हुआ है, जहां हजारों आदिवासी परिवार पीढ़ियों से रह रहे हैं। इन ग्रामीणों की आय का मुख्य जरिया लघु वनोपज और जंगल ही हैं। खनन शुरू होने से उनकी आजीविका छीन जाएगी और उनकी प्राचीन संस्कृति व परंपराएं भी नष्ट हो जाएंगी। स्थानीय समुदायों का कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन और जंगल को उजड़ने नहीं देंगे।

हाथियों के कॉरिडोर और ऐतिहासिक रामगढ़ पहाड़ को खतरा

पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में खनन से लेमरू हाथी रिजर्व और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन वाले रास्तों (कॉरिडोर) को भारी नुकसान पहुंचेगा। इससे मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखने वाले रामगढ़ पहाड़ के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। खनन की गतिविधियों से इस पुरातात्विक विरासत को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

विधानसभा के संकल्प की अनदेखी का लगा आरोप

हसदेव बचाओ आंदोलन ने याद दिलाया कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें हसदेव क्षेत्र के सभी कोल ब्लॉकों को निरस्त करने की बात कही गई थी। आंदोलनकारियों का आरोप है कि वर्तमान सरकार उस संकल्प और जनता की भावनाओं के विपरीत जाकर काम कर रही है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल से कोयले की मांग घट रही है, ऐसे में नए कोल ब्लॉक की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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