सहकारी मार्कफेड गोदामों में 14 करोड़ का ‘कचरा’ सहेजने के लिए सरकार ने फूंक दिए 6 करोड़ रुपये, सरकारी लापरवाही या खुली लूट

छत्तीसगढ़ में सरकारी संपत्तियों के रखरखाव को लेकर एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। मार्कफेड (छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ) के गोदामों में बरसों से करोड़ों रुपये का खराब और अमानक बारदाना यानी जूट के बोरे धूल फांक रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यह या तो एक बड़ा घोटाला है या फिर घोर प्रशासनिक लापरवाही, जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाया जा रहा है। जिस सामान का कोई मोल नहीं, उसे सरकारी गोदामों में वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है।

बेकार बोरों का 6 करोड़ रुपये किराया

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस 14 करोड़ रुपये की कीमत वाले अनुपयोगी बारदाने को सहेजकर रखने के लिए सरकार ने पिछले पांच सालों में लगभग 6 करोड़ रुपये सिर्फ किराए के तौर पर चुका दिए हैं। नियम यह कहता है कि जो सामग्री उपयोग के लायक नहीं है, उसे समय रहते नीलाम या नष्ट कर देना चाहिए। लेकिन यहां खराब बोरों को गोदामों में कब्जा जमाए रखने की इजाजत दी गई और उनका भारी-भरकम किराया भी भरा गया।

जिलों में बिखरा लापरवाही का जाल

यह समस्या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में फैली हुई है। दंतेवाड़ा से लेकर बिलासपुर और दुर्ग तक, हर जगह मार्कफेड के गोदामों में अमानक बोरों का अंबार लगा है। जांजगीर-चांपा और राजनांदगांव जैसे जिलों में तो खराब बारदाने और उनके किराए की राशि करोड़ों में पहुंच चुकी है। जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो समझ आता है कि किस तरह संसाधनों की बर्बादी की गई है।

जिलावार खराब बारदाना और चुकाया गया किराया

जिलाअनुपयोगी बारदाना (₹)अमानक बारदाना (₹)कुल खराब बारदाना (अनुमानित ₹)चुकाया गया किराया (₹)
जांजगीर चांपा60,55,3511,00,00,0001,60,55,35193,00,000
राजनांदगांव5,00,0001,73,00,0001,78,00,00015,46,000
दुर्ग4,41,0002,22,00,0002,26,41,00017,34,000
महासमुंद38,00,00065,00,0001,03,00,00091,71,000
धमतरी36,00,00095,00,0001,31,00,00043,75,000
बिलासपुर28,29,72072,62529,02,34579,35,000
कांकेर87,00,00087,00,00029,82,000
रायगढ़19,00,00019,00,00048,98,000
दंतेवाड़ा2,43,1642,43,1645,98,000
सुकमा1,46,8701,46,870जानकारी नहीं

आखिर क्या होता है बारदाना और क्यों हुआ खराब?

साधारण भाषा में कहें तो बारदाना उन जूट के बोरों को कहा जाता है जिनमें समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी कर उसे सुरक्षित रखा जाता है। नियम के मुताबिक ये बोरे मजबूत और मानक स्तर के होने चाहिए। लेकिन 14 करोड़ के ये बोरे या तो घटिया क्वालिटी के खरीदे गए या फिर खुले आसमान के नीचे छोड़ दिए गए जिससे ये सड़ गए। अब ये न तो धान भरने के काम के हैं और न ही किसी अन्य उपयोग के, फिर भी इन्हें ‘सरकारी माल’ समझकर ढोया जा रहा है।

नीलामी की नाकाम कोशिश और विभागीय चुप्पी

खाद्य मंत्री दयालदास बघेल का कहना है कि इन बोरों को नीलाम करने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई। सवाल यह उठता है कि आखिर पांच साल तक इस प्रक्रिया को क्यों लटकाया गया? क्या किसी को फायदा पहुंचाने के लिए नीलामी नहीं की गई? विपक्ष अब इसे “बारदाना घोटाला” बताकर उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहा है। जनता भी यह पूछ रही है कि जब बुनियादी सुविधाओं के लिए फंड की कमी का रोना रोया जाता है, तब कचरे पर करोड़ों रुपये कैसे लुटाए जा सकते हैं।

भंडारण व्यवस्था पर पुराने दाग

छत्तीसगढ़ में भंडारण को लेकर यह कोई पहली शिकायत नहीं है। इससे पहले भी धान के चूहों द्वारा खा जाने या बारिश में भीगकर सड़ जाने की खबरें आती रही हैं। बारदाने का यह नया मामला उसी कड़ी का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर इन बोरों का निपटान कर दिया जाता, तो न केवल 6 करोड़ रुपये का किराया बचता, बल्कि गोदामों में नई फसल रखने के लिए जगह भी खाली हो जाती।

अधिकारियों की भूमिका और जवाबदेही पर सवाल

इस पूरे खेल में खरीद से लेकर गुणवत्ता जांच और किराए की फाइल पास करने वाले अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। किसी भी जिम्मेदार अफसर ने यह सुध नहीं ली कि जिस सामान की कीमत खत्म हो चुकी है, उसका किराया क्यों दिया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री इस मामले में दोषियों पर क्या कार्रवाई करते हैं। क्या सिर्फ कागजी सफाई दी जाएगी या फिर जनता के पैसे की बर्बादी करने वालों की जवाबदेही तय होगी?

क्या होगा आगे का रास्ता?

अब शासन स्तर पर इस खराब स्टॉक की नए सिरे से गणना और नीलामी की तैयारी की जा रही है। उम्मीद है कि जल्द ही इन गोदामों को खाली कराया जाएगा ताकि अनावश्यक खर्च को रोका जा सके। हालांकि, अब तक जो 6 करोड़ रुपये पानी में बह चुके हैं, उसकी भरपाई होना नामुमकिन है। सरकार को अब भंडारण के लिए सख्त नियम और समय-समय पर ऑडिट की व्यवस्था लागू करनी होगी ताकि भविष्य में ऐसे घपलों को रोका जा सके।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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