नक्सल मुक्ति के दावे पर सियासी घमासान: 31 मार्च की डेडलाइन खत्म होने पर कांग्रेस हमलावर, सरकार से पूछे 10 तीखे सवाल

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के दावों पर अब सियासत गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की समयसीमा बीतने के बाद कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने सरकार को घेरते हुए पूछा है कि क्या अब छत्तीसगढ़ को आधिकारिक तौर पर नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है? कांग्रेस का कहना है कि महज तारीखें तय कर देने से जमीन पर शांति नहीं आती। इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी पलटवार करते हुए इसे केवल राजनीतिक बयानबाजी करार दिया है।

कांग्रेस की घेराबंदी: सरकार के दावों की हकीकत पर मांगे 10 जवाब

सुशील आनंद शुक्ला ने सरकार के सामने सवालों की एक लंबी फेहरिस्त रखी है। कांग्रेस का कहना है कि यदि नक्सलवाद खत्म हो गया है, तो फिर बस्तर के हालात में क्या बदलाव आया है? पार्टी ने निम्नलिखित 10 बिंदुओं पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है:

  • नक्सल मुक्त क्षेत्र: क्या प्रदेश का कोई भी कोना अब नक्सल प्रभावित नहीं रह गया है?
  • हिंसा की गारंटी: क्या सरकार यह भरोसा दिलाएगी कि अब भविष्य में कोई नक्सली वारदात नहीं होगी?
  • तय पैमाने: नक्सलवाद खत्म करने के लिए सरकार ने कौन से मानक तय किए थे और उनमें से कितने पूरे हुए?
  • बस्तर में शांति: क्या अब बस्तर की धरती पर निर्दोष ग्रामीणों का खून बहना पूरी तरह बंद हो जाएगा?
  • सुरक्षाबलों की वापसी: यदि समस्या खत्म हो गई है, तो बस्तर के अंदरूनी इलाकों से कितने सुरक्षाबल हटाए गए?
  • आवाजाही की आजादी: क्या आम नागरिक अब बस्तर के किसी भी दुर्गम इलाके में बेखौफ आ-जा सकते हैं?
  • मुठभेड़ पर सवाल: क्या अब नक्सलवाद के नाम पर निर्दोष आदिवासियों के फर्जी एनकाउंटर रुकेंगे?
  • सुरक्षा की समीक्षा: नक्सलियों के नाम पर नेताओं और अफसरों को दी गई अतिरिक्त सुरक्षा की समीक्षा होगी या नहीं?
  • जल-जंगल-जमीन: क्या आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों पर अब पूरी आजादी और अधिकार मिलेंगे?
  • झीरम का न्याय: झीरम घाटी हमले के असली साजिशकर्ताओं को सजा कब मिलेगी?

संसद में गूंजा मुद्दा: अमित शाह के बयान से शुरू हुई जुबानी जंग

नक्सलवाद के खात्मे को लेकर विवाद की शुरुआत लोकसभा में अमित शाह के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य हासिल करने का दावा किया था। उन्होंने चर्चा के दौरान पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर भी हमला बोला और आरोप लगाया कि उनके शासनकाल में नक्सलियों को परोक्ष रूप से संरक्षण मिलता था। केंद्र सरकार का तर्क है कि सुरक्षाबलों की नई रणनीति और विकास कार्यों के चलते नक्सलियों का प्रभाव अब केवल कुछ पॉकेट्स तक ही सीमित रह गया है और संगठित नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है।

भूपेश बघेल का पलटवार: आरोपों को बताया बेबुनियाद और झूठा

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्रीय गृह मंत्री के आरोपों पर सख्त ऐतराज जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि अगर केंद्र सरकार के पास कांग्रेस द्वारा नक्सलियों को संरक्षण देने का कोई भी सबूत था, तो उसे पहले सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? बघेल ने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार के समय भी नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए गए थे और ‘विश्वास, विकास और सुरक्षा’ की नीति के तहत काम किया जा रहा था। उन्होंने सलाह दी कि नक्सलवाद जैसे संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय ठोस धरातल पर काम होना चाहिए।

भविष्य की चुनौतियां: क्या केवल कागजों में सिमट जाएगा नक्सलवाद?

बस्तर के जानकार मानते हैं कि नक्सलवाद केवल एक सुरक्षा संबंधी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और भौगोलिक चुनौती भी है। सरकार के 2026 के डेडलाइन वाले दावे और कांग्रेस के सवालों के बीच आम जनता अब जमीनी बदलाव का इंतजार कर रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार बस्तर से सुरक्षा कैंपों को कम करने का साहस दिखाती है या फिर शांति का यह दावा केवल फाइलों तक ही सीमित रहेगा। फिलहाल, यह मुद्दा छत्तीसगढ़ की राजनीति में आने वाले कई महीनों तक छाया रहने वाला है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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