
छत्तीसगढ़ में ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। संयुक्त मसीही समाज के बैनर तले हजारों लोगों ने नवा रायपुर के तूता धरनास्थल पर एकत्रित होकर सरकार के इस नए कानून के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की। प्रदर्शन में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। समाज का कहना है कि यह विधेयक उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है। प्रदर्शनकारियों ने राजभवन घेरने की कोशिश की, लेकिन प्रशासन की कड़ी बैरिकेडिंग के कारण उन्हें धरनास्थल पर ही रोक दिया गया, जिसके बाद राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
संवैधानिक अधिकारों की दुहाई: समाज ने कहा- धर्मनिरपेक्षता पर चोट
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की आजादी देता है। मसीही समाज के नेताओं ने मंच से कहा कि इस विधेयक में ‘लालच’ जैसे शब्दों की परिभाषा स्पष्ट नहीं है, जिसका दुरुपयोग निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए किया जा सकता है। समाज का कहना है कि स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वालों पर इस तरह की पाबंदियां लगाना लोकतंत्र के खिलाफ है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इसमें संशोधन नहीं किया, तो वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
भारी सुरक्षा और बैरिकेडिंग: तूता में ही थमी हजारों की भीड़
मसीही समाज ने पहले ही राजभवन के घेराव का ऐलान कर दिया था, जिसे देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। तूता धरनास्थल के चारों ओर कई स्तरों की बैरिकेडिंग की गई थी। जब हजारों की संख्या में लोग राजभवन की ओर बढ़ने लगे, तो पुलिस ने उन्हें वहीं रोक दिया। स्थिति को संभालने के लिए भारी संख्या में बल तैनात रहा। समाज के पदाधिकारियों ने मौके पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं और मांग की कि विधेयक के विवादित प्रावधानों को हटाया जाए।

कड़े दंड का प्रावधान: आजीवन कारावास तक की सजा
विजय शर्मा द्वारा पेश किया गया यह नया विधेयक 1968 के पुराने कानून की जगह लेगा। सरकार का दावा है कि इसका मकसद बल, धोखे या प्रलोभन के जरिए होने वाले धर्मांतरण को रोकना है। हालांकि, इसमें सजा के प्रावधान बेहद सख्त रखे गए हैं:
- सामान्य अवैध धर्मांतरण: 7 से 10 साल की जेल और ₹5 लाख जुर्माना।
- नाबालिग या महिला का धर्मांतरण: 10 से 20 साल की कैद और ₹10 लाख जुर्माना।
- सामूहिक धर्मांतरण: 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और ₹25 लाख तक का दंड।
- मददगारों पर भी गाज: धर्मांतरण में सहयोग करने वालों को 3 साल तक की सजा हो सकती है।
प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य: 60 दिन पहले कलेक्टर को बताना होगा
विधेयक के अनुसार, अब राज्य में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया बेहद जटिल हो जाएगी। यदि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलना चाहता है, तो उसे 60 दिन पहले जिला कलेक्टर को इसकी लिखित सूचना देनी होगी। इतना ही नहीं, जो धार्मिक गुरु (पादरी, मौलवी या पुजारी) धर्मांतरण का अनुष्ठान कराएंगे, उन्हें भी प्रशासन को पहले से जानकारी देनी होगी। बिना सूचना के किए गए किसी भी धर्म परिवर्तन को कानूनन अवैध माना जाएगा। इसके अलावा, विदेशी फंडिंग लेने वाली संस्थाओं पर भी इस कानून के जरिए शिकंजा कसा जाएगा।
शादी और धर्मांतरण: केवल विवाह के लिए धर्म बदलना पड़ेगा महंगा
विधेयक में ‘लव जिहाद’ जैसे मामलों को ध्यान में रखते हुए शादी के लिए किए जाने वाले धर्मांतरण पर भी कड़ा रुख अपनाया गया है। यदि कोर्ट को लगता है कि किसी व्यक्ति ने केवल शादी करने के उद्देश्य से धर्म बदला है, तो उस विवाह को शून्य (अवैध) घोषित किया जा सकता है। इन मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए हर जिले में विशेष अदालतें गठित की जाएंगी। सरकार का लक्ष्य है कि धर्मांतरण से जुड़े किसी भी विवाद का निपटारा अधिकतम 6 महीने के भीतर कर लिया जाए।
गरमाया राजनीतिक माहौल: विपक्ष का वॉकआउट और बस्तर में तनाव
विधानसभा में इस विधेयक के पारित होने के दौरान काफी हंगामा हुआ था। सत्तापक्ष ने इसे सामाजिक सुरक्षा के लिए जरूरी बताया, जबकि विपक्ष ने इसे एक वर्ग विशेष को निशाना बनाने वाला बताते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया था। बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में धर्मांतरण पहले से ही एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस नए कानून के आने के बाद इन क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। समाज ने साफ कर दिया है कि उनका आंदोलन थमने वाला नहीं है और वे जल्द ही पूरे राज्य में मशाल रैली निकालेंगे।



