
छत्तीसगढ़ सरकार ने धान खरीदी के अंतिम दौर में एक बड़ा कदम उठाते हुए धान के उठाव (परिवहन) पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी है। मार्कफेड द्वारा जारी इस आदेश के बाद प्रदेश भर के खरीदी केंद्रों और राइस मिलरों में हड़कंप मच गया है। अब तक नियम यह था कि खरीदी के साथ-साथ मिलर धान का उठाव कर रहे थे, लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत पूरी खरीदी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही उठाव शुरू किया जाएगा। इस अचानक आए बदलाव से पूरी सप्लाई चेन प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
रीसाइक्लिंग रोकने के लिए कड़ा कदम
प्रशासन ने यह सख्त फैसला धान की ‘रीसाइक्लिंग’ की शिकायतों के बाद लिया है। हाल ही में कई राइस मिलों पर हुई छापेमारी में स्टॉक कम पाया गया था। आशंका जताई जा रही है कि कुछ मिलर सरकारी केंद्रों से धान उठाने के बाद उसे बिचौलियों के माध्यम से वापस किसानों के नाम पर केंद्रों में बेच देते हैं। इसे ही रीसाइक्लिंग कहा जाता है, जिससे मिलरों को दोहरा फायदा और सरकार को भारी आर्थिक नुकसान होता है। इसी गड़बड़ी को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने फिलहाल गेट पास जारी करना बंद कर दिया है।
खरीदी केंद्रों में धान का लगेगा अंबार
उठाव बंद होने का सबसे बुरा असर खरीदी केंद्रों पर पड़ेगा। केंद्रों में पहले से ही लाखों क्विंटल धान का स्टॉक जमा है। नियमित उठाव होने से जगह खाली होती रहती थी, लेकिन अब स्टॉक रुकने से केंद्रों में पैर रखने तक की जगह नहीं बचेगी। प्रभारियों का कहना है कि यदि 31 जनवरी तक धान का उठाव नहीं हुआ, तो नए धान को रखने के लिए बफर लिमिट पार हो जाएगी। इससे न केवल अव्यवस्था फैलेगी, बल्कि खुले में रखे धान के खराब होने का डर भी बना रहेगा।
राइस मिलरों को भारी आर्थिक चपत
छत्तीसगढ़ राइस मिलर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष योगेश अग्रवाल के मुताबिक, इस फैसले से मिलरों को दोहरा नुकसान होगा। मिलिंग का काम बढ़ाने के लिए मिलर्स ने बाहर से भारी संख्या में मजदूर बुलाए हैं और दर्जनों वाहन किराए पर ले रखे हैं। उठाव बंद होने से काम ठप पड़ जाएगा, लेकिन मिलरों को मजदूरों का खर्च और वाहनों का किराया बिना काम के ही भुगतना पड़ेगा। पहले से जारी किए गए कई डीओ (Delivery Order) अब अधर में लटक गए हैं, जिससे मिलों की आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है।
मिलिंग रुकने से अन्य उद्योग भी होंगे ठप
राइस मिलों का काम रुकने का असर केवल चावल तक सीमित नहीं रहेगा। मिलिंग के दौरान निकलने वाले भूसे (Husk) और कोढ़ा (Bran) पर आधारित कई अन्य उद्योग भी संकट में आ जाएंगे। भूसे से बिजली बनाने वाले प्लांट, पोल्ट्री फार्म, राइस ब्रान ऑयल कंपनियां और ईंट भट्ठों को कच्चा माल मिलना बंद हो जाएगा। यदि मिलें लंबे समय तक बंद रहीं, तो इन सहायक उद्योगों में भी उत्पादन ठप होने की नौबत आ जाएगी, जिससे बेरोजगारी और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ सकता है।
पंजाब मॉडल की तर्ज पर व्यवस्था की मांग
मिलर्स का तर्क है कि यदि सरकार को उठाव पर रोक लगानी ही थी, तो यह नियम सीजन की शुरुआत से लागू होना चाहिए था। पंजाब जैसे राज्यों में धान खरीदी पूरी होने तक मिलों को धान नहीं दिया जाता, जिससे रीसाइक्लिंग की गुंजाइश नहीं रहती। छत्तीसगढ़ में ऐन वक्त पर फैसला लेने से प्रबंधन बिगड़ गया है। मिलर्स का कहना है कि अगर उन्हें पहले पता होता, तो वे मजदूर और वाहनों का बंदोबस्त उसी हिसाब से करते। अब अचानक काम रुकने से उनकी पूरी प्लानिंग फेल हो गई है।
गुणवत्ता खराब होने और शॉर्टेज का खतरा
खरीदी केंद्र प्रभारियों ने चेतावनी दी है कि धान का उठाव न होने से स्टॉक में ‘शॉर्टेज’ की समस्या पैदा हो सकती है। लंबे समय तक धान खुले में रहने से उसमें सूखत आती है और चूहों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, मौसम में बदलाव होने पर धान की गुणवत्ता खराब हो सकती है, जिसका खामियाजा बाद में समितियों को भुगतना पड़ता है। केंद्रों पर बफर लिमिट से ज्यादा माल जमा होने से अब तौल प्रक्रिया की गति भी धीमी पड़ सकती है।
31 जनवरी तक की चुनौती
सरकार ने स्पष्ट किया है कि भले ही उठाव पर रोक है, लेकिन किसानों से धान खरीदी जारी रहेगी। समितियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्थानीय स्तर पर तालमेल बिठाकर 31 जनवरी तक धान की आवक संभालें। चूंकि अब खरीदी के गिने-चुने दिन बचे हैं, इसलिए केंद्रों पर किसानों की भीड़ बढ़ना तय है। बिना उठाव के इतनी भारी मात्रा में धान को सुरक्षित रखना और सुचारू रूप से तौल करना मैदानी अमले के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।
प्रशासन और मिलर्स के बीच बढ़ता तनाव
फिलहाल प्रशासन ने साफ कर दिया है कि जब तक रीसाइक्लिंग रोकने के पुख्ता इंतजाम नहीं होते, तब तक नया गेट पास जारी नहीं होगा। दूसरी ओर, मिलर्स और समिति प्रबंधक इस आदेश को वापस लेने या बीच का रास्ता निकालने की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यदि यह गतिरोध खत्म नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर धान खरीदी के अंतिम आंकड़ों और किसानों के भुगतान की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।



