
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति और उसके परिवार को दहेज के झूठे मामले में घसीटना मानसिक क्रूरता है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बेंच ने धमतरी फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को पलटते हुए पति की तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई पत्नी बिना किसी ठोस आधार के अपने ससुराल वालों पर आपराधिक केस दर्ज कराती है, तो यह पति के लिए असहनीय मानसिक आघात की तरह होता है।
विवाद की शुरुआत: 2009 में हुई थी शादी, 2017 में दर्ज हुआ केस
धमतरी के धर्मेंद्र साहू का विवाह साल 2009 में संध्या साहू के साथ हुआ था। शुरुआती वर्षों में सब कुछ ठीक रहा और उनकी दो बेटियां भी हुईं। हालांकि, समय के साथ आपसी विवाद बढ़ने लगे। विवाद इतना गहरा गया कि साल 2017 में संध्या ने अपने पति, सास और देवर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की धारा 498A के तहत पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। केस दर्ज कराने के बाद वह अपने मायके चली गई और फिर कभी वापस नहीं लौटी।
5 साल तक कोर्ट के चक्कर: ट्रायल के बाद पति और ससुराल वाले हुए बरी
दहेज प्रताड़ना के इस मामले में पति और उसके परिवार ने करीब पांच साल तक अदालती कार्यवाही का सामना किया। इस दौरान उन्हें समाज में अपमान और गिरफ्तारी के डर के साए में जीना पड़ा। साल 2022 में ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी की और पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार थे। सबूतों के अभाव में कोर्ट ने पति और उसके परिजनों को ससम्मान बरी कर दिया। इसी बरी होने के फैसले को आधार बनाकर पति ने तलाक के लिए कानूनी रास्ता चुना।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: निर्दोष होकर भी मुकदमा झेलना गहरा जख्म
धमतरी फैमिली कोर्ट ने पहले पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि निर्दोष होने के बावजूद 5 साल तक आपराधिक मुकदमे का दंश झेलना किसी भी व्यक्ति के लिए गहरा जख्म है। समाज में प्रतिष्ठा को पहुंचनी वाली ठेस और मानसिक तनाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि पत्नी का यह व्यवहार पति के प्रति क्रूरता की श्रेणी में आता है और ऐसे माहौल में साथ रहना संभव नहीं है।
15 साल पुरानी शादी भंग: पत्नी को गुजारा भत्ते के लिए मिली छूट
अदालत ने क्रूरता के आधार पर धर्मेंद्र और संध्या की 15 साल पुरानी शादी को खत्म करने का आदेश दिया। इसी के साथ 2009 में शुरू हुआ यह रिश्ता कानूनी तौर पर समाप्त हो गया। हालांकि, अदालत ने मानवीय आधार पर पत्नी के अधिकारों का भी ध्यान रखा है। कोर्ट ने संध्या को यह छूट दी है कि वह भविष्य में अपना जीवन यापन करने के लिए स्थायी गुजारा भत्ते (Alimony) के लिए अलग से आवेदन कर सकती है।



