
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने पदोन्नति के एक मामले में विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और अनदेखी पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को नियोक्ता की मनमानी या प्रशासनिक देरी के कारण उसके वैध पदोन्नति अधिकारों से वंचित किया जाता है, तो न्यायालय ऐसे मामलों में मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता। यह फैसला उन सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर आया है जो विभाग की आंतरिक राजनीति या सुस्ती का शिकार होते हैं।
जस्टिस ए. के. प्रसाद की कड़ी टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई जस्टिस ए. के. प्रसाद की एकल पीठ में हुई। अपने फैसले में उन्होंने अधिकारियों की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासनिक अक्षमता का खामियाजा किसी निर्दोष कर्मचारी को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए उन्हें उनकी संशोधित वरिष्ठता के आधार पर सभी काल्पनिक लाभ दिए जाएं, ताकि उनके बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा और सम्मान बरकरार रहे।
पीड़ित सालिकराम चंद्राकर का मामला
यह पूरा विवाद सालिकराम चंद्राकर से जुड़ा है, जो भारत सरकार के जल संसाधन विभाग में तटबंध निरीक्षक के रूप में रुद्री, धमतरी में पदस्थ थे। उन्होंने अधिवक्ता स्वाति वर्मा के माध्यम से याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि उन्हें 2012 की स्थिति से वरिष्ठता का लाभ दिया जाए और सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर काल्पनिक पदोन्नति प्रदान की जाए, जिससे वे वंचित रह गए थे।
पदोन्नति हेतु पात्रता और विभागीय नियम
विभागीय नियमों के अनुसार, तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए प्रयोगशाला सहायक ग्रेड-ए (तकनीशियन) के रूप में 8 वर्ष और ग्रेड-बी के रूप में 12 वर्ष की सेवा अनिवार्य थी। याचिकाकर्ता ने इन सभी मानदंडों को पूरा किया था। 11 फरवरी 2011 की वरिष्ठता सूची में उनका नाम वरिष्ठता क्रम में बिल्कुल सही स्थान पर था, जिसे विभाग ने स्वयं स्वीकार किया था।
विभाग की दुविधा और 2012 की चूक
साल 2011 की सूची जारी करते समय विभाग ने स्वयं एक नोट दर्ज किया था कि पदोन्नति के 25% कोटे को लेकर नियम स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए निर्देशों की प्रतीक्षा है। इसी स्पष्टता के अभाव में मई 2012 में विभाग ने सालिकराम के समकक्ष सुरेंद्र कुमार तिवारी को तो पदोन्नत कर दिया, लेकिन सालिकराम का नाम छोड़ दिया गया। विभाग ने बाद में पद रिक्त न होने का बहाना बनाकर उनके आवेदन को खारिज कर दिया था।
10 वर्षों की अनुचित देरी का प्रभाव
सालिकराम चंद्राकर को अंततः फरवरी 2019 में तटबंध निरीक्षक बनाया गया, लेकिन यह पदोन्नति लगभग 10 साल की देरी से हुई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जिस पद के वे 2007 से 2012 के बीच हकदार थे, उसे देने में विभाग ने अनावश्यक समय लगाया। इस देरी के कारण उनकी आगे की पदोन्नति और भविष्य की वरिष्ठता पूरी तरह से प्रभावित हो गई।
कनिष्ठों को लाभ और याचिकाकर्ता की उपेक्षा
विवाद तब और गहरा गया जब अप्रैल 2022 में विभाग ने रिनू टोप्पो और अरुण कुमार टंडन जैसे कनिष्ठ कर्मचारियों को सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर पदोन्नत कर दिया। याचिकाकर्ता की वरिष्ठता अधिक होने के बावजूद उन्हें इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया। इसके विरोध में जब सालिकराम ने विभाग के सामने अपनी बात रखी, तो उनकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
सूचना के अधिकार (RTI) में भी मिली निराशा
प्रशासनिक स्तर पर कोई सुनवाई न होने पर सालिकराम ने नवंबर 2022 में सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दिया। उन्होंने प्रमोट हुए उम्मीदवारों की वरिष्ठता और नियमों की जानकारी मांगी थी। दुखद बात यह रही कि सूचना अधिकारी ने भी कोई जवाब नहीं दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि विभाग जानबूझकर तथ्यों को छिपा रहा है और याचिकाकर्ता के साथ अन्याय कर रहा है।
राज्य शासन का बचाव और तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वकीलों ने तर्क दिया कि 2022 की डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) की बैठक में याचिकाकर्ता निर्धारित मानदंडों या वरिष्ठता क्रम में नहीं आ रहे थे। सरकार ने आरक्षण रोस्टर और वरिष्ठता सूची का हवाला देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि याचिकाकर्ता पदोन्नति के पात्र नहीं थे, लेकिन कोर्ट इन तर्कों से सहमत नहीं हुआ।
अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि 2012 में याचिकाकर्ता के नाम पर विचार न करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी विभाग अपनी गलती या नियमों की गलत व्याख्या का लाभ नहीं उठा सकता और न ही किसी कर्मचारी के पहले से अर्जित अधिकारों को बाद में लागू किए गए रोस्टर से खत्म किया जा सकता है।
न्यायालय का अंतिम आदेश और निर्देश
कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 7 मई 2012 से काल्पनिक रूप से तटबंध निरीक्षक माना जाए और उन्हें वरिष्ठता सूची में उचित स्थान दिया जाए। चूंकि वे अगस्त 2023 में रिटायर हो चुके हैं, इसलिए उन्हें पिछले वेतन का नकद बकाया तो नहीं मिलेगा, लेकिन उनकी पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की पुनर्गणना नए वेतनमान के आधार पर की जाएगी। यह कार्य विभागीय अधिकारियों को शीघ्रता से पूर्ण करने का निर्देश दिया गया है।



