छत्तीसगढ़ में धान खरीदी पर संकट: टोकन के लिए भटक रहे किसान, मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन, सरकार से की ये बड़ी मांग

बस्तर: छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का अभियान अपने अंतिम पड़ाव पर है, लेकिन बस्तर संभाग के किसानों के लिए स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। यहां बड़ी संख्या में ऐसे किसान हैं जिन्होंने खेती के लिए भारी कर्ज लिया है, लेकिन अब धान बेचने के लिए उन्हें सरकारी दफ्तरों की खाक छाननी पड़ रही है। किसानों की सबसे बड़ी शिकायत टोकन को लेकर है। जब किसान खरीदी केंद्रों पर पहुंच रहे हैं, तो सिस्टम में उनके रकबे का सत्यापन नहीं दिख रहा है। ‘एग्रिस्टेक’ (AgriStack) पोर्टल में नाम दर्ज न होने या तकनीकी खामियों के चलते टोकन नहीं कट पा रहे हैं। इस वजह से किसान अपनी उपज मंडियों तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं।

मुख्यमंत्री के नाम कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन

समस्या का समाधान न होता देख परेशान किसानों ने एकजुट होकर जिला कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को ज्ञापन भेजा है। किसानों ने मांग की है कि टोकन जारी करने की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 14 या 15 फरवरी तक किया जाए। इसके अलावा, उन्होंने एग्रिस्टेक पोर्टल और सत्यापन की वेबसाइट को दोबारा खोलने की अपील की है ताकि जिन किसानों का नाम तकनीकी वजहों से छूट गया है, वे अपना रकबा सुधार सकें। किसानों का कहना है कि सरकार ने पोर्टल बंद कर दिया है, जिससे सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है और वे दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

कर्ज के बोझ तले दबे आदिवासी किसान

बस्तर के प्रभावित किसान सुभाष बघेल और जगनाथ कश्यप ने बताया कि उन्होंने खेती के लिए हजारों रुपये का ऋण लिया था। उनकी उम्मीद थी कि धान बेचकर वे इस कर्ज को समय पर चुका देंगे, लेकिन अब टोकन न मिलने से उन पर ब्याज का बोझ बढ़ रहा है। किसानों का आरोप है कि वे तहसील और एसडीएम कार्यालय के कई चक्कर लगा चुके हैं, जहां उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहा है। कुछ किसानों ने तो यह भी मांग उठाई है कि अगर सरकार धान नहीं खरीद पा रही है, तो उनका ऋण माफ किया जाए। किसानों का कहना है कि ‘दाना-दाना खरीदने’ का वादा करने वाली सरकार के दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

लिमिट और तारीखों के खेल में फंसा अन्नदाता

किसान मोहन बघेल के मुताबिक, उन्होंने करीब 3 लाख रुपये का कर्ज लिया है लेकिन अब तक अपनी फसल का केवल छोटा हिस्सा ही बेच पाए हैं। कई किसानों ने तो अभी तक एक दाना भी नहीं बेचा है। किसानों का कहना है कि 31 जनवरी तक के टोकन पहले ही बांटे जा चुके हैं, ऐसे में नए टोकन के लिए जगह नहीं बच रही है। खरीदी केंद्रों में लिमिट कम होने और टोकन की समय सीमा खत्म होने के डर से किसान चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि सरकार न केवल तारीख बढ़ाए बल्कि खरीदी की प्रति एकड़ सीमा में भी ढील दे ताकि वे अपना पूरा स्टॉक खाली कर सकें।

विपक्ष ने सरकार पर बोला तीखा हमला

किसानों की इस समस्या को लेकर सियासत भी गरमा गई है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकार की नीयत किसानों को लेकर साफ नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर पोर्टल बंद कर और तारीखें न बढ़ाकर किसानों को हतोत्साहित कर रही है। बैज ने कहा कि किसानों को समय पर खाद नहीं मिला और अब उन्हें उपज बेचने के लिए रुलाया जा रहा है। कांग्रेस ने इसे किसानों के साथ बड़ी ठगी करार देते हुए चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही तारीखें नहीं बढ़ाई गईं, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

सरकारी आश्वासन और भविष्य की उम्मीदें

प्रशासनिक अधिकारियों ने किसानों के ज्ञापन को स्वीकार करते हुए शासन तक उनकी बात पहुंचाने का भरोसा दिया है। हालांकि, टोकन की ऑनलाइन प्रक्रिया बंद होने से तकनीकी स्तर पर कई पेच फंसे हुए हैं। फिलहाल किसानों की निगाहें रायपुर स्थित मंत्रालय पर टिकी हैं कि क्या सरकार उनकी मांगों पर विचार करते हुए पोर्टल को दोबारा खोलेगी या खरीदी की मियाद बढ़ाएगी। बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में धान खरीदी केवल एक आर्थिक प्रक्रिया नहीं बल्कि किसानों के पूरे साल की मेहनत का फल है, जिस पर अब संशय के बादल मंडरा रहे हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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