
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई पति अपनी पत्नी की कथित क्रूरता को माफ कर देता है और उसके साथ दोबारा गृहस्थी बसा लेता है, तो बाद में वह उसी पुरानी बात को आधार बनाकर तलाक नहीं मांग सकता। हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को सिरे से रद्द कर दिया है। जस्टिस की खंडपीठ ने माना कि वैवाहिक जीवन में ‘माफी’ के बाद पुराने विवाद कानूनी तौर पर खत्म मान लिए जाते हैं।
498-ए के केस के बाद भी 7 साल तक रहे साथ
इस मामले की जड़ें साल 2003 में हुई एक शादी से जुड़ी हैं। शादी के पांच साल बाद पत्नी ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना (धारा 498-ए) का मुकदमा दर्ज कराया था। साल 2009 में कोर्ट ने पति को इस मामले में दोषमुक्त कर दिया। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब केस खत्म होने के बाद साल 2010 से लेकर 2017 तक दोनों फिर से पति-पत्नी की तरह एक साथ रहे। हाईकोर्ट ने इसी बात को अपना मुख्य आधार बनाया कि जब पति ने सात साल तक पत्नी के साथ रहकर समझौता कर लिया, तो अब पुरानी क्रूरता का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1) की व्याख्या
अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की बारीकियों को समझाते हुए कहा कि धारा 13(1) के तहत तलाक की डिक्री तभी मिल सकती है जब पीड़ित पक्ष ने आरोपित कृत्य को माफ न किया हो। इस केस में पति ने खुद अपनी मर्जी से पत्नी को घर में वापस रखा और लंबा समय साथ बिताया। कानून की नजर में इसे ‘कंडोनेशन’ या गलती की माफी माना जाता है। एक बार जब किसी कृत्य को वैवाहिक जीवन में स्वीकार कर लिया जाता है, तो उसे बाद में कानूनी हथियार की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
देर से लगाए गए चरित्र पर आरोप संदेहास्पद
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पति ने साल 2023 में अपनी याचिका में संशोधन कर पत्नी के किसी अन्य पुरुष से संबंध होने के आरोप जोड़े थे। हाईकोर्ट ने इन आरोपों को भी खारिज कर दिया। अदालत का कहना था कि यह आरोप बहुत देरी से लगाए गए हैं और संदेहास्पद लगते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि पति को पत्नी के आचरण पर आपत्ति थी, तो उसने उस घटना के बाद भी पत्नी के साथ रहना क्यों जारी रखा? साथ रहने का सीधा मतलब है कि उसने उन बातों को भी नजरअंदाज या माफ कर दिया था।
निचली अदालत का फैसला हाईकोर्ट ने पलटा
इससे पहले परिवार न्यायालय ने पति की दलीलों को स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री जारी कर दी थी। परिवार न्यायालय ने 498-ए के मुकदमे को मानसिक क्रूरता माना था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस सोच को बदलते हुए कहा कि निचली अदालत ने सात साल तक साथ रहने के तथ्य को नजरअंदाज कर दिया। हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील को जायज ठहराया और कहा कि वैवाहिक रिश्तों में स्थायित्व लाने के लिए कानून यह मानता है कि माफी के बाद रिश्तों की नई शुरुआत होती है।
समाज और परिवारों के लिए बड़ा संदेश
हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि तलाक केवल आरोपों के आधार पर नहीं मिलता, बल्कि आचरण भी मायने रखता है। अगर कोई पक्ष प्रताड़ना का दावा करता है लेकिन हकीकत में उसी व्यक्ति के साथ खुशी-खुशी रह रहा है, तो कानून उसे प्रताड़ना नहीं मानेगा। इस फैसले से उन मामलों में कमी आने की उम्मीद है जहां पुराने और सुलझ चुके विवादों को वर्षों बाद दोबारा कुरेदकर तलाक की मांग की जाती है। अदालत ने साफ कर दिया कि सुलह के बाद पुराने जख्मों को कुरेदना कानूनी तौर पर गलत है।



