
दुर्ग: मशहूर कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उर्फ बागेश्वर सरकार एक बार फिर अपने बयानों के चलते विवादों के घेरे में हैं। छत्तीसगढ़ के दुर्ग में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने पत्रकारों के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया, उसने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। शास्त्री ने सवालों को “खुजली” से जोड़ते हुए पत्रकारों पर तंज कसा। लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ माना जाता है और सवाल पूछना उसका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन एक सार्वजनिक मंच से इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी को प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना जा रहा है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि आस्था के नाम पर इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कमजोर करती है।
‘खुजली’ और ‘ठठरी’ जैसे शब्दों का प्रयोग: क्या यही है प्रवचन की भाषा?
कार्यक्रम के दौरान धीरेंद्र शास्त्री के चेहरे पर नफरत के भाव साफ देखे गए। उन्होंने भरे मंच से कहा कि “जिस पत्रकार को खुजली हो, वह आकर सवाल पूछे।” इतना ही नहीं, उन्होंने पत्रकारों की “ठठरी” बांधने जैसी आपत्तिजनक बात भी कही। किसी की मृत्यु की कामना करना या सार्वजनिक रूप से डराने वाली भाषा का प्रयोग करना किसी साधारण व्यक्ति के लिए भी उचित नहीं माना जाता, लेकिन जब कोई व्यक्ति धर्म की गद्दी पर बैठकर ऐसी बातें करता है, तो उस धर्म की गरिमा पर भी सवाल उठने लगते हैं। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सभ्य समाज में संवाद का यह स्तर स्वीकार्य होना चाहिए।
भूपेश बघेल का तीखा हमला: चमत्कार और मेडिकल कॉलेज के विरोधाभास पर उठाए सवाल
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मामले में धीरेंद्र शास्त्री और प्रदीप मिश्रा जैसे कथावाचकों को आड़े हाथों लिया है। बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पवन दीवान जैसे बड़े कथावाचक हुए जिन्होंने सादगी से जीवन जिया, लेकिन आज के ये कथावाचक करोड़ों-अरबों की संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि अगर झाड़-फूंक और दिव्य दरबार से ही लोग ठीक हो रहे हैं, तो ये कथावाचक खुद मेडिकल कॉलेज और बड़े अस्पताल क्यों खोल रहे हैं? बघेल ने आरोप लगाया कि धर्म के नाम पर सरकारी संसाधनों का उपयोग कर ये लोग अपनी निजी रियासतें खड़ी कर रहे हैं।
पत्रकारिता के पेशे पर चोट: सवाल पूछने वालों को मिल रही धमकियां
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और प्रभावशाली लोगों से जवाब मांगना है। लेकिन धीरेंद्र शास्त्री जैसे व्यक्ति असहज सवालों पर अपमानजनक भाषा और ‘राज खोल देने’ जैसी धमकियों का सहारा लेते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि केवल प्रशंसा करने वाले पत्रकारों का ही स्वागत है। विडंबना यह है कि अपनी शोहरत और संदेश फैलाने के लिए ये लोग मीडिया का ही सहारा लेते हैं, लेकिन जब जवाबदेही की बारी आती है, तो पत्रकारों को हिकारत की नजर से देखा जाता है। इस मामले ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सार्वजनिक जीवन में अपमान को आशीर्वाद मान लेने की प्रवृत्ति कितनी खतरनाक है।
मीडिया की मजबूरी या निजी निष्ठा? पांव छूने वाले पत्रकारों पर भी उठे सवाल
इस पूरे विवाद में उन पत्रकारों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं जो पेशेवर मर्यादा भूलकर ऐसे कथावाचकों के पांव छूते हैं या उनके आशीर्वाद के आकांक्षी बने रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब पत्रकार स्वयं किसी व्यक्ति के सामने नतमस्तक हो जाते हैं, तो पूरे पेशे की साख कमजोर होती है। मीडिया के भीतर एक बड़ा तबका ऐसा है जो व्यक्तिगत निष्ठा के चक्कर में अपमान को भी पेशेवर खतरा मानकर झेल लेता है। यह समय पत्रकारों के लिए भी आत्ममंथन का है कि वे अपनी और अपने पेशे की गरिमा को इन धमकियों के सामने किस तरह सुरक्षित रख सकते हैं।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी: सवालों को स्वीकार करना ही परिपक्वता
किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में सवाल पूछना समाज की जीवंतता का प्रमाण होता है। सम्मान कभी एकतरफा नहीं हो सकता। प्रभावशाली व्यक्तियों के शब्दों का समाज पर गहरा असर पड़ता है, इसलिए भाषा की मर्यादा और संवेदनशीलता अनिवार्य है। पत्रकारों का सार्वजनिक अपमान करना केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि उस संवाद संस्कृति का अपमान है जिसने अब तक समाज को जोड़े रखा है। भक्त भले ही अपमान को उपलब्धि मान लें, लेकिन सार्वजनिक जीवन में शालीनता की लक्ष्मण रेखा लांघना भविष्य के लिए एक डरावना संकेत है।



