
छत्तीसगढ़ के इतिहास में इस साल एक ऐसा बदलाव हुआ जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर, जहां अब तक हमेशा ‘ड्राय डे’ रहता था, इस बार प्रदेशभर की शराब दुकानें खुली नजर आईं। आमतौर पर 30 जनवरी और 2 अक्टूबर को गांधी जी के सम्मान में पूरे देश में शराब की बिक्री पर पाबंदी रहती है। लेकिन इस बार आबकारी विभाग की ओर से कोई नया निषेध आदेश जारी नहीं होने के कारण शराब की दुकानों पर आम दिनों की तरह ही भीड़ दिखी। इस निर्णय ने सामाजिक और राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है।
विपक्ष का वार: तानाशाही और बापू का अपमान
कांग्रेस ने इस घटना को मुद्दा बनाते हुए भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेताओं ने कहा कि राजस्व बटोरने की होड़ में सरकार ने राष्ट्रपिता के आदर्शों और नैतिक मूल्यों को दरकिनार कर दिया है।
विपक्ष का आरोप है कि जानबूझकर उन परंपराओं को खत्म किया जा रहा है जो गांधीवादी विचारधारा से जुड़ी हैं। कांग्रेस ने इसे सरकार की ‘तानाशाही’ बताते हुए राज्य की छवि धूमिल करने वाला कदम करार दिया है। पार्टी का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि बापू की शहादत का अपमान है।
सरकार की चुप्पी और प्रशासनिक तर्क
इस पूरे विवाद पर सत्तापक्ष की ओर से फिलहाल कोई बड़ा बयान सामने नहीं आया है। हालांकि प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि दुकानों का संचालन सरकारी कैलेंडर और तय छुट्टियों की सूची के हिसाब से ही किया गया है। भाजपा समर्थकों का तर्क है कि कांग्रेस मुद्दों की कमी के कारण हर बात को गांधी जी के अपमान से जोड़कर देख रही है। जानकारों का मानना है कि इस बार आबकारी कैलेंडर में बदलाव के चलते यह स्थिति बनी है। फिलहाल इस मुद्दे ने राज्य के सियासी तापमान को बढ़ा दिया है और दोनों ही दल अपनी-अपनी विचारधारा को लेकर आमने-सामने हैं।



