
रायपुर। NHM Niyamitikaran Protest: छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाएं एक बार फिर आंदोलन की आंच में झुलसने वाली हैं। प्रदेश के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के कर्मचारियों ने 18 अगस्त 2025 से अनिश्चितकालीन आंदोलन की घोषणा कर दी है। आंदोलन का कारण है—सरकार से वर्षों से लंबित दस सूत्रीय मांगें, जिन पर अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं।
“अब या कभी नहीं”: कर्मचारी बोले, मांगें पूरी करो या आंदोलन झेलो
NHM Protest: छत्तीसगढ़ एनएचएम कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमित मिरी ने साफ शब्दों में कहा है कि अब कर्मचारी आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा,
“कई सालों से हम सिर्फ धैर्य और प्रतीक्षा कर रहे हैं। हर बार सरकार ने आश्वासन दिया लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। अब अगर शासन ने हमारी मांगें नजरअंदाज कीं, तो जिम्मेदारी हमारी नहीं, सरकार की होगी।”
NHM Niyamitikaran: हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि कर्मचारी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित करने से बचने की पूरी कोशिश करेंगे, लेकिन “अब संघर्ष ही विकल्प है।”
ये हैं NHM कर्मचारियों की दस प्रमुख मांगें
- संविलियन और स्थायीकरण की मांग
- पब्लिक हेल्थ कैडर की स्थापना
- ग्रेड पे का स्पष्ट निर्धारण
- कार्य मूल्यांकन में पारदर्शिता
- 27% लंबित वेतन का भुगतान
- नियमित भर्ती में सीटों का आरक्षण
- अनुकंपा नियुक्ति की सुविधा
- मेडिकल और अन्य छुट्टियों की मान्यता
- स्थानांतरण नीति का निर्धारण
- न्यूनतम 10 लाख का कैशलेस मेडिकल बीमा
सरकार की चुप्पी से बढ़ा गुस्सा
CG NHM Employees Protest News: कर्मचारियों का आरोप है कि लगातार ज्ञापन और मुलाकातों के बाद भी न तो कोई ठोस निर्णय लिया गया और न ही संवाद की पहल हुई। संगठन का कहना है कि यदि सरकार ने अब भी इन मांगों पर गंभीरता नहीं दिखाई, तो आंदोलन पूरे प्रदेश में व्यापक रूप लेगा।
स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा असर
Govt Employees Protest NHM: के अंतर्गत बड़ी संख्या में डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन, डेटा ऑपरेटर, और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी काम कर रहे हैं। इनके आंदोलन पर जाने से ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाएं सबसे अधिक प्रभावित होंगी।
CG NHM Strike: छत्तीसगढ़ में NHM कर्मचारियों की यह नाराज़गी अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। सरकार के लिए यह आखिरी मौका हो सकता है जब वो संवाद से हल निकाल ले, वरना 18 अगस्त से प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था ठप पड़ सकती है। जनता और मरीजों की तकलीफ की ज़िम्मेदारी फिर किसकी होगी? यह सवाल सरकार के दरवाजे पर खड़ा है।



