
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से मानवता और वन्यजीवों के प्रति प्रेम की एक बेहद भावुक तस्वीर सामने आई है। बंगुरसिया सर्किल में एक नन्हे हाथी शावक की तालाब में डूबने से मौत हो गई, जिससे पूरा गांव शोक में डूब गया। ग्रामीणों ने केवल शोक ही नहीं जताया, बल्कि शावक की आत्मा की शांति के लिए बकायदा दशकर्म और मृत्युभोज का आयोजन किया। यह घटना दर्शाती है कि जंगलों के करीब रहने वाले लोगों का हाथियों के साथ कितना गहरा और आत्मीय जुड़ाव है।
कैसे हुई यह दुखद घटना?
यह मामला रायगढ़ वन परिक्षेत्र के बड़झरिया तालाब का है। बीते 19 दिसंबर 2025 की रात करीब 32 हाथियों का एक विशाल दल तालाब में पानी पीने और नहाने पहुंचा था। इसी दौरान एक छोटा शावक गहरे पानी में चला गया और डूबने से उसकी मौत हो गई। रात के सन्नाटे में जब हाथियों के चिंघाड़ने की आवाजें आईं, तो वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। वहां का मंजर देख सबकी आंखें नम हो गईं क्योंकि बड़े हाथी अपने मृत शावक को पैरों के सहारे पानी से बाहर निकालने और उठाने की कोशिश कर रहे थे।
हाथियों का शोक देख पिघला ग्रामीणों का दिल
शावक की मौत के बाद हाथियों का दल वहां से जाने को तैयार नहीं था। कई दिनों तक गजराज का कुनबा उसी जंगल के आसपास डटा रहा और उनके चिंघाड़ने की आवाजों से उनका दर्द पूरे गांव को महसूस हो रहा था। हाथियों के इस विलाप को देखकर बंगुरसिया और नंवापारा के ग्रामीणों ने फैसला किया कि वे इस दुख की घड़ी में हाथियों के साथ खड़े होंगे। ग्रामीणों का मानना था कि शावक का अंतिम संस्कार और दशकर्म होने से ही हाथियों का संताप कम होगा।
घर-घर से चंदा जुटाकर किया आयोजन
इस धार्मिक अनुष्ठान के लिए ग्रामीणों ने आपसी सहयोग की मिसाल पेश की। गांव के हर घर से स्वेच्छा से दान एकत्र किया गया और एक साझा बैठक कर पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई। रविवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण भजन-कीर्तन करते हुए उस तालाब के पास पहुंचे जहां हादसा हुआ था। स्थानीय बैगा ने विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई और तालाब का शुद्धिकरण किया। ग्रामीणों ने मिलकर भगवान से प्रार्थना की कि जंगल और वन्यजीव सुरक्षित रहें।
अफसर और ग्रामीण एक साथ बैठे पंगत में
दशकर्म के बाद आयोजित मृत्युभोज में न केवल ग्रामीण बल्कि वन विभाग के अधिकारी भी शामिल हुए। बंगुरसिया की फॉरेस्टर प्रेमा तिर्की और आरएफओ ज्योति ध्रुव सहित अन्य कर्मचारियों ने ग्रामीणों के साथ बैठकर भोजन ग्रहण किया। इस दौरान ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि वे हाथियों के साथ संघर्ष के बजाय सह-अस्तित्व की राह पर चलेंगे। इस आयोजन के बाद से इलाके में शांति है और ग्रामीण इसे अपनी संस्कृति और जीव-प्रेम का हिस्सा मान रहे हैं।



