
बिलासपुर हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने कहा है कि जब तक यह साबित न हो जाए कि जाति का नाम सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर अपमानित करने की नीयत से लिया गया है, तब तक इसे अपराध नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकल पीठ ने 16 साल पुराने एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया और आरोपी मनोज पांडे को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है।
चंदे के विवाद से शुरू हुआ था मामला
यह पूरा विवाद सितंबर 2008 का है, जब पथरिया स्थित बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर उत्तरा कुमार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इंजीनियर का आरोप था कि दुर्गा पूजा के लिए 1000 रुपये का चंदा न देने पर आरोपी मनोज पांडे ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। साल 2010 में सत्र न्यायालय ने इसी आधार पर मनोज को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। हालांकि, इसी मामले के एक अन्य आरोपी को पर्याप्त सबूत न होने के कारण पहले ही बरी कर दिया गया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
गवाहों के पलटने और सबूतों की कमी पर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर गौर किया कि मामले के सभी स्वतंत्र गवाह मुकर गए थे और उन्हें ‘होस्टाइल’ घोषित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जब निचली अदालत ने आरोपी को मारपीट, धमकी और गाली-गलौज जैसी आईपीसी की अन्य धाराओं से पहले ही बरी कर दिया था, तो केवल शिकायतकर्ता के बयान पर एससी/एसटी एक्ट की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थान पर अपमानित करने का उद्देश्य सिद्ध न होने की स्थिति में सिर्फ जाति का उल्लेख करना कानूनन अपराध की श्रेणी में नहीं आता।



