
छत्तीसगढ़ में मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) सीटों को लेकर महीनों से चल रहा घमासान अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। बिलासपुर हाईकोर्ट की कड़ी फटकार के बाद राज्य सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। सरकार ने देर शाम राजपत्र में संशोधन जारी कर दिया है। नए नियमों के मुताबिक, ऑल इंडिया कोटा की 50% सीटें छोड़ने के बाद बची हुई 50% राज्य कोटे की सीटें अब केवल छत्तीसगढ़ के शासकीय मेडिकल कॉलेजों से पढ़े छात्रों और सुदूर क्षेत्रों में सेवा दे रहे ‘इन-सर्विस’ डॉक्टरों के लिए सुरक्षित रहेंगी। छात्रों ने इसे अपनी बड़ी जीत बताते हुए कहा है कि यह उनकी कानूनी लड़ाई और सड़क पर किए गए संघर्ष का नतीजा है।
स्वास्थ्य मंत्री की नीति और नीयत पर उठे सवाल
इस पूरे विवाद में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की भूमिका को लेकर मेडिकल छात्रों में भारी आक्रोश है। छात्रों का सीधा आरोप है कि मंत्री जिस नई नीति को लागू करने पर अड़े थे, वह स्थानीय छात्रों के हितों के खिलाफ थी। हाईकोर्ट में सरकार की दलीलें टिक नहीं सकीं, जिसे छात्र संगठनों ने स्वास्थ्य मंत्री की रणनीतिक हार बताया है। अब चर्चा इस बात पर भी गरम है कि क्या यह केवल एक प्रशासनिक चूक थी या फिर किसी खास लॉबी को फायदा पहुंचाने की कोशिश, क्योंकि हाईकोर्ट की सख्ती के बाद ही विभाग को अपनी गलती सुधारनी पड़ी।
प्राइवेट कॉलेजों की सीटों पर अब भी बरकरार है ‘पेंच’
सरकारी कॉलेजों में तो राहत मिल गई है, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों की 50% पीजी सीटों को लेकर विवाद अब भी सुलझा नहीं है। छात्र संगठनों का कहना है कि प्राइवेट कॉलेजों की आधी सीटें राज्य से बाहर के छात्रों के लिए खोल दी गई हैं, जिससे छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों के अवसर कम होंगे। आरोप है कि पहले ये सीटें 100% स्थानीय छात्रों के लिए हुआ करती थीं, लेकिन रसूखदार लॉबी के दबाव में नियमों को बदल दिया गया। इसके अलावा एम्स (AIIMS) रायपुर के छात्रों को राज्य कोटे में शामिल करने पर भी स्थानीय छात्रों ने आपत्ति जताई है।
काउंसलिंग में अव्यवस्था: 25 साल में पहली बार होगा ऐसा
छत्तीसगढ़ के 25 साल के इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है जब पीजी दाखिले के लिए तीसरी बार काउंसलिंग करानी पड़ रही है। स्वास्थ्य विभाग की इस लचर कार्यप्रणाली और खराब योजना की वजह से सैकड़ों छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। छात्रों का कहना है कि बार-बार नियम बदलने और स्पष्ट नीति न होने के कारण काउंसलिंग की प्रक्रिया मजाक बनकर रह गई है। विभाग की इसी लापरवाही के कारण छात्रों को बार-बार अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ‘अवैध वसूली’ का आरोप
जूनियर डॉक्टरों ने निजी मेडिकल कॉलेजों के प्रबंधन पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। छात्रों का कहना है कि तय फीस से कहीं अधिक पैसे वसूले जा रहे हैं। ट्रेनिंग और अन्य शुल्कों के नाम पर उन पर जबरन आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। इसके अलावा ग्रामीण चिकित्सा बॉन्ड और शपथ पत्र जैसी शर्तें भी कथित तौर पर गलत तरीके से थोपी जा रही हैं। छात्रों के मुताबिक, यह सब एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा है जिसके आगे सरकारी तंत्र पूरी तरह लाचार नजर आ रहा है।
आंदोलन अभी खत्म नहीं, आर-पार की लड़ाई की तैयारी
जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने साफ कर दिया है कि उनकी यह जीत अभी अधूरी है। उनका कहना है कि जब तक प्राइवेट कॉलेजों में छत्तीसगढ़ी छात्रों का हक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाता, तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे। एम्स रायपुर की पात्रता और निजी कॉलेजों की फीस विसंगतियों को लेकर छात्रों ने आगे भी आंदोलन और कानूनी लड़ाई जारी रखने की चेतावनी दी है। छात्रों का कहना है कि यह केवल सीटों की संख्या का मामला नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के मेडिकल छात्रों के सम्मान और भविष्य की बात है।
आंकड़ों में समझिए पीजी सीटों का गणित
सीटों के बंटवारे और वर्तमान स्थिति को आप नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:
| श्रेणी | स्थिति | वर्तमान बदलाव |
| शासकीय कॉलेज (राज्य कोटा) | 50% सीटें | स्थानीय और इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए सुरक्षित |
| प्राइवेट कॉलेज (PG सीटें) | 50% बाहरी कोटा | बाहरी छात्रों के लिए प्रवेश की अनुमति (विवादित) |
| काउंसलिंग का दौर | तीसरा चरण | छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार तीसरी बार काउंसलिंग |
| विवाद का मुख्य कारण | डोमिसाइल नीति | बाहरी छात्रों को प्रवेश देने के फैसले पर विरोध |
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