
Dussehra In Sri Lanka History: भारत में विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन देश के कोने-कोने में रामलीला के समापन के बाद रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के ऊंचे-ऊंचे पुतलों का दहन किया जाता है। लेकिन जिस लंकापति रावण का वध इस दिन हुआ था, क्या कभी आपने सोचा है कि आज के श्रीलंका में इस त्योहार को कैसे देखा जाता है? क्या वहां भी रावण के पुतले फूंके जाते हैं या फिर इतिहास की इस महान शख्सियत को लेकर वहां के निवासियों की सोच बिल्कुल अलग है? आइए जानते हैं इस दिलचस्प सांस्कृतिक पहलू को।
भारत और श्रीलंका के बीच सांस्कृतिक एवं धार्मिक अंतर
Ravana Tradition Sri Lanka Dussehra 2026: भारत में इस वर्ष दशहरा बीस अक्टूबर को मनाया जाएगा, जहां पर्व का मुख्य आधार भगवान श्रीराम की विजय और अधर्म पर धर्म की जीत है। इसके विपरीत पड़ोसी देश श्रीलंका का सांस्कृतिक और धार्मिक ताना-बाना भारत से भिन्न है। श्रीलंका की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध धर्म का पालन करती है, हालांकि वहां एक छोटा हिंदू समुदाय भी निवास करता है जो अपने पारंपरिक पर्व मनाता है। यही कारण है कि वहां भारत की तरह सार्वजनिक रूप से रामलीला का मंचन या रावण दहन जैसे बड़े आयोजन नहीं होते हैं।
श्रीलंका के इतिहास और जनमानस में रावण की अलग छवि
Pannipitiya Sri Devram Vihara Parade: भारत में जिसे अहंकार और बुराई के प्रतीक के रूप में हर साल जलाया जाता है, उसी रावण को श्रीलंका के इतिहास में एक अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है। वहां के स्थानीय निवासी रावण को कोई खलनायक नहीं, बल्कि प्राचीन लंका का एक पराक्रमी राजा, महान योद्धा और वेदों का प्रकांड विद्वान मानते हैं। श्रीलंका के कई हिस्सों में आज भी उसे एक कुशल शासक और शिव भक्त के रूप में याद किया जाता है। इसी ऐतिहासिक दृष्टिकोण के कारण वहां कभी भी रावण के पुतले जलाने की परंपरा विकसित नहीं हुई।
हाथी की पीठ पर रावण की प्रतिमा रखकर निकाला जाता है जुलूस
Cultural Difference India Sri Lanka Dussehra: भले ही श्रीलंका में रावण दहन नहीं किया जाता, लेकिन वहां उससे जुड़ी एक अनोखी और भव्य परंपरा जरूर देखने को मिलती है। श्रीलंका के एक प्रसिद्ध मंदिर में हर साल एक सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाता है, जिसमें रावण की एक विशाल प्रतिमा को सजाए गए हाथी की पीठ पर विराजमान किया जाता है। इस पारंपरिक आयोजन में सजे-धजे हाथियों की शोभायात्रा, पारंपरिक लोक नृत्य और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान शामिल होते हैं। स्थानीय भाषा में इस भव्य आयोजन को ‘मेदिन महा पेराहेरा’ कहा जाता है।
पन्निपिटिया के श्री देव्रम विहार मंदिर में होता है मुख्य आयोजन
Sri Lanka Ravana Worship History: श्रीलंका में रावण की प्रतिमा के साथ निकाले जाने वाले इस प्रसिद्ध जुलूस का मुख्य केंद्र कोलंबो के पास स्थित पन्निपिटिया क्षेत्र है। यहां का ऐतिहासिक ‘श्री देव्रम विहार मंदिर’ इस सांस्कृतिक आयोजन की मेजबानी करता है। हर साल मार्च के महीने में यह मंदिर इस बड़े उत्सव का केंद्र बन जाता है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। मंदिर परिसर से शुरू होने वाली यह यात्रा बौद्ध संस्कृति और प्राचीन इतिहास के अनोखे तालमेल को प्रदर्शित करती है।
मार्च की पूर्णिमा यानी मेदिन पोया पर आयोजित होता है यह उत्सव
यह पूरा आयोजन बौद्ध धर्म के पवित्र कैलेंडर से गहराई से जुड़ा हुआ है। श्रीलंका में यह उत्सव मार्च के महीने में आने वाली पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जिसे ‘मेदिन पोया’ कहा जाता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार मार्च की इस पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व इस बात से जुड़ा है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के पश्चात पहली बार अपने पैतृक नगर कपिलवस्तु लौटे थे। इसी पवित्र तिथि के दौरान मंदिर में रावण की प्रतिमा के साथ पेराहेरा जुलूस निकाला जाता है।
दुनिया भर के पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनती है यह परंपरा
श्रीलंका में आयोजित होने वाला यह अनोखा पेराहेरा जुलूस केवल स्थानीय लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशों से आने वाले पर्यटकों के लिए भी कौतूहल का विषय बना रहता है। जहां एक ओर भारत में दशहरे के दिन रावण को परास्त करने की खुशी मनाई जाती है, वहीं दूसरी ओर श्रीलंका में उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास किया जाता है। यह विविध परंपरा दोनों देशों के बीच की सांस्कृतिक विभिन्नता और इतिहास को देखने के अलग-अलग नजरियों को बखूबी दर्शाती है।



