
छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) में 16 और 17 अक्टूबर 2025 की तारीख माओवादी आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई है। पहली बार किसी केंद्रीय समिति (Central Committee) के सदस्य के नेतृत्व में 210 नक्सलियों ने एक साथ हथियार डालकर मुख्यधारा से जुड़ने का फैसला किया। इस घटना को देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक आत्मसमर्पण माना जा रहा है। पर सवाल यह है क्या ये माओवादी सच में ‘सरेंडर’ कर रहे हैं या किसी नई लड़ाई की तैयारी में हैं?
बीजापुर के जंगलों से निकला सशस्त्र जत्था
एनडीटीवी की टीम जब बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक से करीब 12 किलोमीटर दूर इंद्रावती नदी के उस पार पहुंची, तो उसने देखा कि वर्दी पहने नक्सलियों का एक लंबा जत्था कतारबद्ध होकर आगे बढ़ रहा था।
ये सभी हथियार लेकर ताडोकोट गांव की ओर बढ़ रहे थे, जहां थोड़ी देर रुककर उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी। इस जत्थे का नेतृत्व कर रहे थे पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्य रुपेश उर्फ सतीश कोफा (Rupesh alias Satish Kofa), जिन्होंने मीडिया से खुलकर बात की और अपनी विचारधारा के नए रूप को सामने रखा।

“हथियार छोड़ रहे हैं, लेकिन समर्पण नहीं”
बातचीत के दौरान रुपेश ने “आत्मसमर्पण” शब्द पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा —
“हम सरेंडर नहीं कर रहे हैं, बल्कि संघर्ष का तरीका बदल रहे हैं। हमने हथियार छोड़े हैं, लेकिन अपने विचार नहीं।”
रुपेश ने कहा कि अब समय आ गया है कि जनता की लड़ाई हथियारों से नहीं बल्कि संवैधानिक तरीके (Constitutional Way) से लड़ी जाए। उनके अनुसार, माओवादी आंदोलन की पुरानी रणनीति अब अप्रासंगिक हो चुकी है क्योंकि “जनता हथियारों से नहीं, अपने अधिकारों की आवाज से बदलाव चाहती है।”
संगठन के भीतर फूट और नेतृत्व की कमजोरी
रुपेश ने खुलासा किया कि संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं के बीच लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि हथियारबंद संघर्ष अब टिकाऊ नहीं है।
उन्होंने बताया —
“पूर्व महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू (Nambala Keshav Rao alias Basavaraju) ने भी सुझाव दिया था कि हमें नए रास्ते अपनाने चाहिए। लेकिन संगठन के कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया, जिसके चलते आंदोलन कमजोर होता गया।”
रुपेश ने आगे कहा कि संगठन अब अपनी वैचारिक दिशा खो चुका है, और अब समय है कि जनता के साथ मिलकर विकास की राह पर चला जाए। उनके मुताबिक, लगातार हुई पुलिस मुठभेड़ों, कम होते संसाधनों और जनता के विश्वास में कमी ने आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी है।
पहले हुई बातचीत, फिर लिया निर्णय
रुपेश ने बताया कि उन्होंने सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की थी, जिसमें कुछ शर्तों पर सहमति बनी। उसी के बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ हथियार छोड़ने का निर्णय लिया।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे और उनके साथी अब किसी भी सशस्त्र सरकारी बल का हिस्सा नहीं बनेंगे।
“हमने तय किया है कि हम दोबारा हथियार नहीं उठाएंगे, चाहे सरकार के लिए ही क्यों न हो। हमारा उद्देश्य अब संघर्ष नहीं, समाज में बदलाव लाना है।”
“संविधान के दायरे में जनता की आवाज बनेंगे”
रुपेश ने कहा कि आगे वे और उनके साथी जनता के बीच जाकर संवैधानिक मार्ग से संघर्ष जारी रखेंगे।
उन्होंने कहा —
“अब हम जनता के अधिकारों की लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से लड़ेंगे। हथियारों की जगह हम संविधान को अपना हथियार बनाएंगे।”
उनका कहना था कि आंदोलन खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसका स्वरूप बदला है।
अब उनका उद्देश्य ग्राम विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों की लड़ाई को शांतिपूर्ण माध्यम से आगे बढ़ाना होगा।
“अब हथियार छोड़ो, जनता के बीच लौटो”
बातचीत के अंत में रुपेश ने अपने संगठन के बाकी साथियों से भी भावनात्मक अपील की —
“जो साथी अभी भी जंगलों में हैं, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि यह रास्ता अब कहीं नहीं जाता। जनता की सेवा करनी है तो हथियार नहीं, हृदय चाहिए।”
उन्होंने कहा कि जो भी साथी मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए सरकार ने रास्ता खोला है।
रुपेश ने भरोसा जताया कि अगर बाकी नक्सली भी हथियार छोड़ दें तो बस्तर जल्द ही पूरी तरह हिंसा-मुक्त क्षेत्र बन सकता है।
“शांति प्रक्रिया की दिशा में बड़ा कदम”
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने रुपेश और अन्य माओवादियों के इस कदम को शांति प्रक्रिया की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताया है। वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि यह सिर्फ एक आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि चार दशक से चली आ रही हिंसक विचारधारा से वैचारिक मुक्ति है।
“अब बस्तर का नया सवेरा”
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है।
लोगों का कहना है कि अगर नक्सल नेता संवैधानिक रास्ता अपनाएं, तो बस्तर का विकास बहुत तेज़ी से हो सकता है।
अब लोगों को उम्मीद है कि जंगलों में बंदूक की जगह शिक्षा, सड़कें और रोज़गार आएंगे।
संघर्ष से संवाद तक का सफर
नक्सल कमांडर रुपेश का बयान एक नई विचारधारा का संकेत देता है हिंसक संघर्ष से हटकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास। यह केवल एक आत्मसमर्पण नहीं बल्कि “विचारों के परिवर्तन का घोषणापत्र” है, जो बताता है कि बस्तर अब बंदूकों की नहीं, संविधान की भाषा समझना चाहता है।



