
बिलासपुर, जून 2025 — छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा के एक दिल दहला देने वाले मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। गैंगरेप और तिहरे हत्याकांड में दोषी पाए गए पांच आरोपियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया है। कोर्ट ने यह कहते हुए यह फैसला सुनाया कि मामला भले ही गंभीर और समाज को झकझोरने वाला है, लेकिन इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
यह ऐतिहासिक फैसला चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों की आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है और उनकी उम्र को देखते हुए फांसी देना उचित नहीं होगा।
क्या था पूरा मामला?
जनवरी 2021 की बात है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के एक गांव की रहने वाली 16 साल की पहाड़ी कोरवा जनजाति की नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप किया गया और फिर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। यही नहीं, उसके पिता (45 वर्ष) और 4 साल की नातिन को भी बेरहमी से मार डाला गया।
पीड़ित परिवार एक विशेष जनजाति से ताल्लुक रखता है और सालभर से गाय-भैंस चराने का मेहनताना मांग रहा था। मृतक ने आरोपी संतराम मंझवार से 8000 रुपए और अनाज की मांग की थी। कुछ नकद और राशन देने के बाद संतराम ने उन्हें घर छोड़ने का झांसा देकर रास्ते में रोका और फिर यह दरिंदगी हुई।
पिता के सामने बेटी से गैंगरेप, फिर तीनों की हत्या
जांच में सामने आया कि संतराम और उसके साथी नाबालिग लड़की और उसके परिवार को जंगल ले गए। वहां आरोपियों ने शराब पी और पीड़ित पिता को भी पिलाई। फिर पिता के सामने ही उसकी बेटी से गैंगरेप किया गया। जब उसने विरोध किया तो उसकी लाठी-डंडों से पीटकर हत्या कर दी गई। इसके बाद आरोपियों ने लड़की और उसकी चार साल की नातिन को भी मार डाला।
जिला कोर्ट ने सुनाई थी फांसी की सजा
जिला एवं अपर सत्र न्यायालय (पॉक्सो कोर्ट) की विशेष न्यायाधीश डॉ. ममता भोजवानी ने इस जघन्य अपराध पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह कृत्य “पाशविक, वीभत्स और समाज को झकझोर देने वाला” है। कोर्ट ने पांच आरोपियों —
संतराम मंझवार (45), अनिल सारथी (20), आनंद दास (26), परदेशी दास (35), और जब्बार उर्फ विक्की (21) को फांसी की सजा सुनाई थी।
जबकि एक अन्य आरोपी उमाशंकर यादव (22) को उम्रकैद मिली थी।
हाईकोर्ट ने क्यों बदली सजा?
मामला जब हाईकोर्ट की पुष्टि के लिए पहुंचा तो कोर्ट ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। बेंच ने कहा कि यह केस बहुत ही दुखद और पीड़ादायक है, लेकिन दोषियों की उम्र, पहली बार अपराध, और उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि न होने की वजह से यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर कैटेगरी में नहीं आता।
क्या अब सवाल नहीं उठेंगे?
इस फैसले से बहस छिड़ गई है — क्या ऐसी वीभत्स घटनाओं में भी मौत की सजा नहीं होनी चाहिए? समाज को झकझोर देने वाले अपराधों में जब सजा कम होती है, तो न्याय की भावना कहीं न कहीं कमजोर पड़ती है।
हाईकोर्ट का यह फैसला कानून की व्याख्या और दया के आधार पर लिया गया है, लेकिन यह चर्चा का विषय जरूर बन गया है।



