एक ही गोत्र में शादी की मिली ‘सजा’: महिला आयोग ने खत्म कराया सामाजिक बहिष्कार, पति-पत्नी को वापस दिलाए पैसे

कोंडागांव: छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले से सामाजिक कुरीतियों को तोड़ने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। यहां एक आदिवासी दंपती को केवल इसलिए दो सालों तक अपमान और बहिष्कार झेलना पड़ा क्योंकि उन्होंने एक ही गोत्र में प्रेम विवाह किया था। समाज के ठेकेदारों ने इसे अपराध मानते हुए परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया था। अंततः राज्य महिला आयोग के हस्तक्षेप के बाद इस दंपती को न केवल समाज में वापस जगह मिली, बल्कि दंड के रूप में वसूली गई 60 हजार रुपये की राशि भी वापस कराई गई। आयोग ने सख्त लहजे में कहा कि किसी भी नागरिक को उसकी मर्जी से शादी करने पर परेशान करना कानूनी अपराध है।

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दो साल तक झेला तिरस्कार का दंश: त्योहारों और सामूहिक आयोजनों से रखा गया दूर, बच्चों को भी सुनने पड़े ताने

पीड़ित महिला ने आयोग के सामने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि पिछले दो वर्षों से उनका जीवन किसी नर्क से कम नहीं था। एक ही गोत्र में शादी करने की वजह से गांव वालों ने उनसे बातचीत बंद कर दी थी। उन्हें राशन तक लाने में दिक्कतें आती थीं और गांव के किसी भी उत्सव में शामिल होने की इजाजत नहीं थी। हद तो तब हो गई जब उनके बच्चों को स्कूल में अपमानित किया गया। समाज का दबाव था कि या तो दोनों अलग हो जाएं या फिर हमेशा के लिए गांव छोड़ दें। इस मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर उन्होंने न्याय की गुहार लगाई।

समझौते के साथ मिली सुरक्षा की गारंटी: अनावेदकों ने स्वीकारी अपनी गलती, लिखित में दिया भविष्य में तंग न करने का वादा

सुनवाई के दौरान जब महिला आयोग ने कड़ा रुख अपनाया, तो समाज के प्रतिनिधि और अनावेदक झुकने पर मजबूर हो गए। उन्होंने स्वीकार किया कि दंपती को परेशान करना गलत था। दंड स्वरूप लिए गए 60 हजार रुपये आवेदिका को वापस लौटाए गए। पति ने भी सबके सामने अपनी पत्नी के साथ पूरी गरिमा के साथ रहने की बात दोहराई। आयोग ने सभी पक्षों से लिखित में लिया है कि भविष्य में इस विवाह में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी। अगर दोबारा बहिष्कार जैसी स्थिति बनी, तो पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई करेगी।

कार्यस्थल पर प्रताड़ना का गंभीर मामला: व्हाट्सएप पर निजी जीवन में दखल देने वाले अफसर पर बढ़ा शिकंजा, कलेक्टर से मांगी गई रिपोर्ट

इसी जनसुनवाई के दौरान कार्यस्थल पर उत्पीड़न का एक और मामला सामने आया। एक महिला कर्मचारी ने शिकायत की कि उनके उच्च अधिकारी व्हाट्सएप संदेशों के जरिए उनके निजी जीवन में दखल देते हैं। कार्यालय समय के बाद भी जबरन रुकने का दबाव बनाया जाता है और बेवजह कारण बताओ नोटिस भेजकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। आयोग ने व्हाट्सएप चैट की प्राथमिक जांच के बाद इसे गंभीर माना है। इस प्रकरण में कोंडागांव कलेक्टर से जांच प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति मांगी गई है। आयोग ने साफ किया कि मर्यादा लांघने वाले अधिकारियों पर सख्त एक्शन होगा।

अस्पताल में दुर्व्यवहार करने वाली नर्स को समझाइश: ड्यूटी के दौरान नर्सों के बीच हुआ था विवाद, लिखित माफी के बाद मामला नस्तीबद्ध

भाटापारा के एक सरकारी अस्पताल से भी अनुशासनहीनता की शिकायत आयोग तक पहुंची। यहां पदस्थ एक नर्स पर ड्यूटी हैंडओवर के दौरान अपनी साथी कर्मचारी के साथ दुर्व्यवहार और गाली-गलौज करने का आरोप था। आयोग ने दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर बात की। आरोपित नर्स को सख्त हिदायत दी गई कि कार्यस्थल पर गरिमा बनाए रखना अनिवार्य है। नर्स ने अपनी गलती मानते हुए भविष्य में ऐसी हरकत न करने की लिखित स्वीकृति दी। इसके बाद आयोग ने इस चेतावनी के साथ मामले को बंद कर दिया कि शिकायत दोबारा मिली तो सीधे पुलिस केस होगा।

दहेज और भरण-पोषण पर हुआ 15 लाख का सेटलमेंट: आपसी सहमति से सुलझा विवाद, एकमुश्त राशि देने पर दोनों पक्ष राजी

दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक पुराने मामले में भी आयोग ने सुलह का रास्ता निकाला। पति-पत्नी के बीच विवाद इतना बढ़ गया था कि साथ रहना मुमकिन नहीं था। आयोग की काउंसलिंग के बाद दोनों पक्षों ने सहमति से अलग होने का फैसला किया। समझौते के तहत पति अपनी पत्नी को भविष्य के भरण-पोषण के लिए एकमुश्त 15 लाख रुपये देने पर राजी हुआ। इस बड़ी राशि के भुगतान की सहमति बनते ही आयोग ने मामले का निराकरण कर दिया। इससे आवेदिका को अदालतों के चक्कर काटने से मुक्ति मिली और उसे अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए आर्थिक आधार मिल गया।

महिला आयोग की सख्त हिदायत: रूढ़िवादी परंपराएं कानून से ऊपर नहीं, हर शिकायत पर होगी त्वरित कार्रवाई

राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि समाज के नाम पर किसी भी महिला के मानवाधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। गोत्र या अन्य पारंपरिक मान्यताओं के नाम पर बहिष्कार करना आदिम युग की सोच है, जो आधुनिक कानून में स्वीकार्य नहीं है। आयोग ने प्रशासन को भी निर्देश दिए हैं कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे मामलों पर नजर रखें ताकि किसी भी परिवार को सामाजिक रूप से अलग-थलग न किया जा सके। आयोग की सक्रियता से कोंडागांव के कई अन्य परिवारों में भी उम्मीद जगी है जो ऐसी ही प्रताड़ना झेल रहे हैं।

समाधान की ओर बढ़ते कदम: कोंडागांव जनसुनवाई में दर्जनों मामलों का हुआ निपटारा, न्याय मिलने पर आवेदिकाओं के खिले चेहरे

कोंडागांव में हुई इस मैराथन सुनवाई ने साबित कर दिया कि अगर महिलाएं निडर होकर अपनी बात रखें, तो न्याय संभव है। गोत्र विवाद सुलझने के बाद पीड़ित दंपती ने राहत की सांस ली है। आयोग ने न केवल उनके पैसे वापस कराए बल्कि समाज में उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा भी बहाल कराई। जनसुनवाई के अंत में कई ऐसी महिलाएं भी नजर आईं जो घरेलू हिंसा और कार्यस्थल की समस्याओं से जूझ रही थीं और आयोग की पहल से उन्हें सुरक्षा का भरोसा मिला। प्रशासन अब इन सभी समझौतों के पालन की निगरानी करेगा।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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