न्यायधानी बिलासपुर में अनुकंपा नियुक्ति का ‘बड़ा खेल’: शिक्षा विभाग के रसूखदारों पर गंभीर आरोप

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर के शिक्षा विभाग में अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विभाग के भीतर नियमों को ताक पर रखकर अपात्रों को नौकरी देने के गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिसने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने इस मामले को प्रमुखता से उठाते हुए संयुक्त संचालक शिक्षा विभाग आरपी आदित्य से मुलाकात की और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की। यह मामला अब केवल प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक रूप से भी गरमाता जा रहा है, जिससे शिक्षा विभाग की छवि पर सवालिया निशान लग रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री के हस्तक्षेप के बाद भी जांच में हीलाहवाली

इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय मंत्री तोखन साहू ने पहले ही कलेक्टर को विस्तृत जांच के निर्देश दिए थे। कलेक्टर के आदेश के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने जांच की प्रक्रिया तो शुरू की, लेकिन उसकी गति और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि विभाग के भीतर के ही लोग मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे हैं। जांच के निर्देश जारी होने के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई न होना, मिलीभगत की ओर इशारा कर रहा है।

एक महीने से लंबित शिकायत: कार्रवाई न होने पर कोर्ट जाने की चेतावनी

अंकित गौरहा ने खुलासा किया कि उन्होंने लगभग एक माह पूर्व संभागायुक्त और संयुक्त संचालक को इस फर्जीवाड़े की लिखित शिकायत सौंपी थी। आश्चर्यजनक रूप से, एक महीना बीत जाने के बाद भी विभाग की ओर से न तो कोई आधिकारिक जवाब दिया गया और न ही किसी दोषी पर कार्रवाई हुई। गौरहा ने कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि जांच में और देरी की गई या सबूतों को दबाने का प्रयास हुआ, तो वे इस पूरे मामले को बिलासपुर हाईकोर्ट तक ले जाएंगे।

अपात्रों को प्राथमिकता और पात्रों के साथ विश्वासघात

शिकायत में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि जिला शिक्षा विभाग में एक दर्जन से अधिक नियुक्तियों में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। गौरहा का दावा है कि जिन परिवारों को वास्तव में अनुकंपा नियुक्ति की आवश्यकता थी और जो पूरी तरह पात्र थे, उन्हें दरकिनार कर दिया गया। उनके स्थान पर उन अपात्र लोगों को नियुक्तियां दी गईं, जिनके पास कथित तौर पर रसूख या आर्थिक शक्ति थी। इस प्रक्रिया में भारी आर्थिक लेन-देन और भ्रष्टाचार की बू आ रही है।

डीईओ-बीईओ की भूमिका संदिग्ध: जांच टीम पर उठाए सवाल

जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए अंकित गौरहा ने कहा कि जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) स्तर पर जांच कराना तकनीकी रूप से गलत है। उनका तर्क है कि जब आरोप उच्च स्तर के अधिकारियों पर हों, तो उनके अधीनस्थ अधिकारी निष्पक्ष जांच कैसे कर सकते हैं? उन्होंने मांग की है कि इस फर्जीवाड़े की जांच के लिए जिला स्तर की एक स्वतंत्र टीम गठित की जानी चाहिए, जो बिना किसी दबाव के दूध का दूध और पानी का पानी कर सके।

बाहरी जिलों के आवेदकों को नियुक्ति: नियमों का खुला उल्लंघन

भ्रष्टाचार के आरोपों की सूची में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। आरोप है कि बिलासपुर जिले के कोटे की अनुकंपा नियुक्तियों में अन्य जिलों के आवेदकों को भी शामिल कर लिया गया। अनुकंपा नियुक्ति के कड़े नियमों के अनुसार, प्राथमिकता स्थानीय और मूल पात्र उम्मीदवारों को मिलनी चाहिए, लेकिन बाहरी जिलों के लोगों की घुसपैठ यह दर्शाती है कि विभाग के भीतर एक संगठित गिरोह सक्रिय है जो नियमों को अपने लाभ के लिए मरोड़ रहा है।

जवाबदेही की मांग और भविष्य की रणनीति

कांग्रेस नेता ने स्पष्ट किया कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की, तो उन्हें न्यायालय के समक्ष जवाबदेह ठहराया जाएगा। शिक्षा विभाग, जिसे समाज का मार्गदर्शक माना जाता है, वहां इस तरह का भ्रष्टाचार बच्चों के भविष्य और सिस्टम के प्रति जनता के विश्वास को चोट पहुँचाता है। फिलहाल, सभी की नजरें संयुक्त संचालक की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि वे इस ‘सिस्टम की सड़न’ को दूर करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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