
CG Journalist Murder Case: छत्तीसगढ़ के बीजापुर से हैरान करने वाली खबर सामने आई है। जिस पत्रकार की हत्या ने राज्यभर में आक्रोश पैदा कर दिया था, उस मामले में गिरफ्तार हुए अफसरों को कोर्ट से झटपट जमानत मिल गई। पत्रकारों में जो उम्मीद की लौ जली थी, वो 24 घंटे में ही बुझ गई।
गिरफ्तारी के अगले ही दिन कोर्ट से मिली राहत
Mukesh Chandrakar Murder Case: बीजापुर जिले के बहुचर्चित पत्रकार मुकेश चंद्राकर हत्या कांड में बुधवार को पांच सरकारी अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई थी। सभी अधिकारी लोक निर्माण विभाग (PWD) से जुड़े थे। जैसे ही इनकी गिरफ्तारी हुई, लोगों और खासकर पत्रकार बिरादरी में यह उम्मीद जगी कि अब इस हाई-प्रोफाइल केस में सख्त कार्रवाई होगी।
लेकिन गुरुवार को ही दंतेवाड़ा की अदालत से इन सभी आरोपियों को जमानत मिल गई। यानी गिरफ्तार हुए, अदालत में पेश हुए, और फिर बेल पर छूट भी गए। इतना सबकुछ 24 घंटे के अंदर ही हो गया।
कौन-कौन हुए गिरफ्तार?
Bijapur News: पुलिस ने इस मामले में 2 EE (एक्जीक्यूटिव इंजीनियर), एक SDO (सब डिविजनल ऑफिसर) और एक अन्य इंजीनियर को गिरफ्तार किया था। इन सभी पर गंगालूर से नेलसनार के बीच सड़क निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार का आरोप है।
यही वो घोटाला था, जिसे पत्रकार मुकेश चंद्राकर लगातार उजागर कर रहे थे। उन्होंने इस घोटाले से जुड़े सबूत जुटाए, रिपोर्ट्स छापीं और आवाज उठाई। लेकिन उसी आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया।
हत्या का आरोप ठेकेदार पर, लेकिन साजिश में अफसरों की भूमिका?
PWD Corruption: 1 जनवरी 2025 को पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या कर दी गई। आरोप है कि ठेकेदार सुरेश चंद्राकर ने अपने लोगों से मिलकर मुकेश को मार डाला और शव को सेप्टिक टैंक में फेंक दिया। शव 3 जनवरी को बरामद हुआ।
मुकेश ने जिन गड़बड़ियों की रिपोर्टिंग की थी, वो ठेकेदार और अफसरों के बीच मिलीभगत की ओर इशारा करती थी। ऐसे में पुलिस ने PWD अफसरों को भी आरोपी बनाया और बुधवार को गिरफ्तार किया।
सवाल यही कि फिर क्या मतलब था इस गिरफ्तारी का?
Viral News 2025: जब गिरफ्तारी के अगले ही दिन बेल मिल जानी है, तो क्या ये सिर्फ कागजी कार्रवाई थी? पत्रकारों की हत्या पर सरकारें अक्सर संवेदना जताती हैं, लेकिन जब कार्रवाई का वक्त आता है तो सब कुछ ढीला पड़ जाता है।
पत्रकार संगठन अब इस पर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि अफसरों को सिर्फ नाम भर के लिए गिरफ्तार किया गया, ताकि दबाव कम किया जा सके।
फिलहाल केस की जांच जारी है। लेकिन ये घटना बता रही है कि पत्रकारिता के लिए आवाज उठाना कितना खतरनाक हो सकता है, और उस खतरे से न्याय कितना अनमना। अब देखना है कि क्या आगे कुछ ठोस कार्रवाई होती है या ये मामला भी फाइलों में बंद होकर रह जाएगा।



