
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक संवाहिका और विश्व विख्यात पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई के स्वास्थ्य को लेकर एक अत्यंत चिंताजनक खबर सामने आई है। भिलाई स्थित उनके निवास से मिली जानकारी के अनुसार, पिछले एक सप्ताह से उनकी स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है। 80 के दशक में अपनी गरजदार आवाज से अंतरराष्ट्रीय मंचों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली तीजन बाई ने पिछले सात दिनों से खाना-पीना पूरी तरह छोड़ दिया है, जिससे उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया है। 8 मार्च को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ से ठीक पहले प्रदेश की इस लाडली बेटी की गिरती सेहत ने करोड़ों प्रशंसकों और कलाकारों को गहरे दुख में डाल दिया है।
बिस्तर पर भी थमी नहीं स्वर साधना: ‘भ्रतहरि’ गुनगुना रही हैं तीजन
शारीरिक व्याधियों और गंभीर कमजोरी के बावजूद तीजन बाई के भीतर की कलाकार आज भी जीवित है। उनके परिजनों ने भावुक होते हुए बताया कि अर्धचेतन अवस्था में भी वे बिस्तर पर लेटे-लेटे “भ्रतहरि” गायन के बोल और महाभारत के प्रसंगों को धीरे-धीरे गुनगुनाती रहती हैं। यह उनकी अपनी कला के प्रति अटूट निष्ठा ही है कि कष्ट के इस दौर में भी उनके होंठ पंडवानी के सुरों को नहीं छोड़ रहे हैं। डॉक्टरों की एक विशेष टीम 24×7 उनके स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी कर रही है।
गनियारी की गलियों से सात समंदर पार तक का गौरवमयी सफर
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को भिलाई के पास गनियारी गांव में हुआ था। कभी औपचारिक शिक्षा के लिए स्कूल की दहलीज न लांघने वाली तीजन ने अपनी अद्भुत प्रतिभा के दम पर दुनिया के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों से 4 से अधिक मानद ‘डी लिट’ की उपाधियां हासिल कीं। उन्होंने अपने नाना बृजलाल से महाभारत की कहानियां सीखीं और समाज के भारी विरोध व बहिष्कार के बावजूद पंडवानी को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ (खड़े होकर गाना) को न केवल अपनाया बल्कि उसे एक वैश्विक पहचान दिलाई।
पद्म विभूषण तक के ऐतिहासिक सम्मानों का सफरनामा
तीजन बाई का कलात्मक जीवन संघर्षों और अद्वितीय उपलब्धियों की एक प्रेरणादायक गाथा है। भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा है:
- प्रमुख सम्मान: 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण।
- अंतरराष्ट्रीय पहचान: जापान का प्रतिष्ठित ‘फुकोका अवार्ड’ और दर्जनों देशों में भारत की सांस्कृतिक राजदूत के रूप में प्रस्तुति।
- अद्वितीय उपलब्धि: कापालिक शैली की पहली महिला कलाकार, जिन्होंने हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर गरजने का साहस दिखाया।
इंदिरा गांधी को किया था मंत्रमुग्ध: तीजन की ‘कापालिक’ शैली का जादू
तीजन बाई से पहले पंडवानी की कापालिक शैली में केवल पुरुष ही प्रस्तुति देते थे, लेकिन तीजन ने इस रूढ़ि को तोड़कर इतिहास रच दिया। उनकी ऊर्जावान गायकी और अभिनय से तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी इतनी प्रभावित हुई थीं कि उन्होंने तीजन को विशेष रूप से दिल्ली बुलाकर उनकी कला की सराहना की थी। आज वही शेरनी जैसी दहाड़ वाली आवाज बिस्तर पर बीमारी से संघर्ष कर रही है, जिसे देख कला प्रेमी और उनके परिचित अत्यंत व्यथित हैं।
अगले 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण: डॉक्टरों की गहन निगरानी
भिलाई स्थित उनके निवास पर वर्तमान में विशेष चिकित्सा व्यवस्था की गई है। डॉक्टरों के अनुसार, आगामी 48 घंटे उनके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण हैं। शासन-प्रशासन के उच्च अधिकारी भी उनके इलाज और स्वास्थ्य अपडेट पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि उन्हें किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सहायता में कमी न हो।
पूरा प्रदेश कर रहा है अपनी ‘दाई’ के लिए दुआएं
आज जब तीजन बाई बिस्तर पर जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही हैं, तब केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मौजूद उनके प्रशंसक उनके शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे हैं। मंदिरों और घरों में लोग अपनी इस महान कलाकार के लिए मन्नतें मांग रहे हैं। छत्तीसगढ़ की जनता अपनी ‘दाई’ के फिर से मंच पर गरजने और तंबूरे की तान पर महाभारत सुनाने की बेसब्री से राह देख रही है।



