
रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी के नवा रायपुर स्थित ‘तूता’ धरना स्थल पर सहायक शिक्षक भर्ती 2023 की मांग को लेकर डीएड अभ्यर्थियों का आमरण अनशन 11वें दिन में प्रवेश कर गया है। 24 दिसंबर 2025 से शुरू हुई इस भूख हड़ताल ने अब गंभीर मोड़ ले लिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे पिछले कई दिनों से बिना अन्न-जल के डटे हुए हैं, जिसके कारण अब तक 100 से अधिक अभ्यर्थियों की हालत नाजुक हो गई है। धरना स्थल पर मौजूद कई युवा कमजोरी और निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) की वजह से बेहोश हो रहे हैं। इनमें से कई को स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जबकि अन्य वहीं डटे हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस और पर्याप्त चिकित्सकीय सुविधाएं मिलने में देरी हो रही है, जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
अदालती आदेशों की अनदेखी का आरोप: हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का चक्कर, फिर भी खाली हाथ
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे युवाओं का तर्क है कि राज्य सरकार बिलासपुर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों का पालन नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 28 अगस्त 2024 को अपने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि प्राथमिक स्तर की शिक्षक भर्ती के लिए बीएड (B.Ed.) अभ्यर्थी पात्र नहीं हैं और डीएड (D.Ed.) धारकों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसी तरह बिलासपुर हाईकोर्ट ने भी 2 अप्रैल 2024 और 26 सितंबर 2025 को भर्ती प्रक्रिया जल्द पूरी करने के निर्देश दिए थे। अभ्यर्थियों का कहना है कि अदालती जीत के बावजूद उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया जा रहा है, जिससे हजारों योग्य युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
बस्तर और सरगुजा के आदिवासी युवाओं पर संकट: खाली पड़े 2,300 पदों में 1,600 एसटी वर्ग के
आंदोलनकारी नेता शैलेंद्र साहू के अनुसार, सहायक शिक्षकों के कुल 2,300 पद अब भी रिक्त हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन खाली पदों में से 1,600 से अधिक पद अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के लिए सुरक्षित हैं। इन पदों पर नियुक्तियां न होने का सीधा असर राज्य के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और दूसरी ओर योग्य आदिवासी युवा बेरोजगार होकर सड़कों पर बैठने को मजबूर हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार एक तरफ आदिवासी कल्याण की बातें करती है और दूसरी तरफ उनके हक की नियुक्तियों को रोक कर बैठी है।
विधानसभा में जवाब से भड़का गुस्सा: शिक्षा मंत्री के रुख ने आंदोलन की आग में डाला घी
इस मामले ने हालिया विधानसभा सत्र के दौरान भी तूल पकड़ा था। 17 दिसंबर 2025 को भाजपा विधायक रीकेश सेन ने इस भर्ती को पूरा करने की समय सीमा पर सवाल दागा था। सदन में शिक्षा मंत्री की ओर से कोई ठोस आश्वासन या निश्चित समय सीमा न बताए जाने से अभ्यर्थियों का सब्र टूट गया। उनका कहना है कि सरकार के ढुलमुल रवैये ने ही उन्हें आमरण अनशन जैसा कड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया है। मंत्री के बयान के बाद से ही धरना स्थल पर भीड़ बढ़ने लगी है और प्रदेश भर से डीएड प्रशिक्षित युवा रायपुर पहुंचने लगे हैं।
गैर-राजनीतिक मंच से सीधी चेतावनी: ‘अगर किसी की जान गई तो जिम्मेदार होगी सरकार’
धरना स्थल पर मौजूद अभ्यर्थियों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका यह आंदोलन पूरी तरह से गैर-राजनीतिक और शांतिपूर्ण है। उनका किसी भी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है, वे केवल अपना संवैधानिक हक मांग रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी है कि यदि भूख हड़ताल के दौरान किसी भी अभ्यर्थी की जान जाती है या स्वास्थ्य को स्थायी नुकसान होता है, तो इसकी पूरी जवाबदेही राज्य सरकार और जिला प्रशासन की होगी। युवाओं का कहना है कि वे अब नियुक्ति पत्र लेकर ही यहां से उठेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत चुकानी पड़े।
ठंडी रातें और सरकार की चुप्पी: सिस्टम की संवेदनहीनता पर उठ रहे सवाल
रायपुर की गिरती रातों और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच खुले आसमान के नीचे बैठे ये युवा सिस्टम की संवेदनहीनता की कहानी कह रहे हैं। 11 दिनों से जारी इस संघर्ष ने शहर के जागरूक नागरिकों और सामाजिक संगठनों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सरकार कोर्ट के आदेश को लागू करने में देरी क्यों कर रही है। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन युवाओं की सुध लेकर अनशन तुड़वाएगी या यह संघर्ष अभी और लंबा खिंचेगा।



