
बस्तर की झीरम घाटी में साल 2013 में हुए भीषण हमले को करीब 12 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसकी सच्चाई आज भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहती है। हाल ही में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी केंद्रीय समिति के सदस्य रुपेश उर्फ सतीश ने इस मामले में नया दावा किया है। रुपेश का कहना है कि झीरम हमले की असल हकीकत क्या थी, यह जांच एजेंसियों को पहले से ही मालूम है। उन्होंने बताया कि कई सरेंडर कर चुके माओवादियों ने पहले ही अपने बयानों में इस घटना की पूरी पटकथा और परिस्थितियों का खुलासा कर दिया है।

रणनीतिक चूक या सोची-समझी साजिश?
झीरम हमले में विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा और नंद कुमार पटेल जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं सहित 30 से ज्यादा लोग मारे गए थे। रुपेश ने बताया कि संगठन की पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति की बैठकों में इस हमले को एक ‘बड़ी रणनीतिक भूल’ माना गया था। उनके मुताबिक, यह हमला किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा नहीं था। माओवादी दरअसल पुलिस बल को निशाना बनाने के लिए ‘टैक्टिकल काउंटर आफेंसिव कैंपेन’ (TCOC) चला रहे थे, लेकिन सूचना तंत्र की कमजोरी और जमीनी कैडर में राजनीतिक समझ की कमी के कारण कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ इसकी चपेट में आ गई।
कवासी लखमा को क्यों छोड़ दिया गया?
इस हमले के दौरान एक बड़ा सवाल हमेशा बना रहा कि आखिर पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा को माओवादियों ने क्यों नहीं मारा। रुपेश ने इस पर स्पष्ट किया कि स्थानीय होने और पहचान के कारण उन्हें छोड़ दिया गया था। वहीं, नंद कुमार पटेल और उदय मुदलियार जैसे नेताओं की हत्या को उन्होंने नेतृत्व करने वाले कमांडरों की अदूरदर्शिता बताया। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी गलती की समीक्षा होने के बावजूद, हमले का नेतृत्व करने वाले कैडर पर कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें संगठन में पदोन्नति दी गई।

बंदूक छोड़कर अब राजनीति की राह पर रुपेश
करीब 35 साल तक जंगलों में भूमिगत जीवन बिताने वाले रुपेश ने बताया कि अब सशस्त्र संघर्ष का दौर खत्म हो चुका है। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले दो-तीन सालों से संगठन के भीतर इस बात पर मंथन चल रहा था कि हिंसा के रास्ते को छोड़ दिया जाए। उन्होंने साफ किया कि सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव और जनता के टूटते भरोसे ने उन्हें मुख्यधारा में लौटने पर मजबूर किया। रुपेश के अनुसार, अब वे जनता की लड़ाई बंदूक से नहीं बल्कि राजनीति के माध्यम से लड़ेंगे, हालांकि उन्होंने अभी किसी राजनीतिक दल में शामिल होने का फैसला नहीं लिया है।

विचारधारा और पिछड़ेपन पर बड़ा खुलासा
माओवादी विचारधारा के जंगलों तक सिमट जाने के सवाल पर रुपेश ने माना कि संगठन ने समय के साथ खुद को अपडेट नहीं किया। उन्होंने स्कूलों को तोड़ने और सड़कें काटने के पीछे तर्क दिया कि जब इन जगहों का इस्तेमाल सुरक्षा बलों के ठहरने या आवाजाही के लिए होने लगा, तब उन्होंने ऐसे कदम उठाए। उन्होंने यह भी माना कि बस्तर में बढ़ते धर्मांतरण से माओवादी संगठन को नुकसान हुआ क्योंकि लोग चर्च से जुड़ने के बाद संगठन से दूर हो गए।
झीरम हमले से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल-जवाब
प्रश्न: क्या माओवादियों ने झीरम हमले के लिए कभी माफी मांगी?
उत्तर: रुपेश ने बताया कि संगठन की समीक्षा बैठक में स्वीकार किया गया था कि राजनीतिक हत्याएं गलत थीं। सार्वजनिक रूप से माफी तो नहीं मांगी गई, लेकिन प्रेस नोट के जरिए इसे अपनी गलती जरूर माना था।
प्रश्न: महेंद्र कर्मा के शव पर हुए अपमानजनक व्यवहार पर संगठन की क्या राय थी?
उत्तर: रुपेश का कहना है कि शव पर हथियार रखकर डांस करने जैसी कोई योजना नहीं थी। वे खुद इसे व्यक्तिगत तौर पर एक बहुत ही गलत और निंदनीय कृत्य मानते हैं।
प्रश्न: क्या माओवादियों को विदेशी फंडिंग या हथियार मिलते थे?
उत्तर: रुपेश ने विदेशी सहायता की बात को पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने दावा किया कि वे पटाखों के बारूद से हथियार बनाते थे और ऑटोमैटिक हथियार उन्होंने सुरक्षा बलों से ही लूटे थे।
प्रश्न: संगठन में लेवी (वसूली) का क्या खेल था?
उत्तर: करोड़ों रुपये की वसूली के आरोपों पर उन्होंने कहा कि वे सिर्फ छोटे ठेकेदारों से उतनी ही रकम लेते थे, जितनी संगठन चलाने के लिए जरूरी होती थी।
प्रश्न: शीर्ष नेता देवजी ने अब तक सरेंडर क्यों नहीं किया?
उत्तर: रुपेश ने बताया कि देवजी केंद्रीय मिलिट्री कमेटी का प्रमुख है और वह मानता है कि परिस्थितियां कैसी भी हों, संघर्ष को जीवित रखना जरूरी है।



