छत्तीसगढ़ में ‘फर्जी धान’ का बड़ा खेल: कागजों पर उग रही फसल और खाली हो रहा सरकारी खजाना, समझिए धान रिसाइकिलिंग का पूरा गणित

रायपुर: छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यहां धान की खरीदी को लेकर एक ऐसा ‘चमत्कार’ हो रहा है जो समझ से परे है। जानकारों का दावा है कि प्रदेश में वास्तविक उत्पादन से कहीं अधिक धान कागजों पर खरीदा जा रहा है। इस खेल के पीछे राइस मिलरों, बिचौलियों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की गहरी सांठगांठ है। आरोप है कि धान की ‘रिसाइकिलिंग’ (पुराने चावल को वापस धान के रूप में बेचना) करके और फर्जी रकबों के जरिए सरकार को हर साल लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का चूना लगाया जा रहा है। अगर सिर्फ वास्तविक किसानों से ही धान खरीदा जाए, तो सरकार का एक बड़ा बजट बच सकता है, जो फिलहाल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।

कैसे होता है ‘कागजी रकबों’ का खेल: किसान बोते हैं सब्जी और पटवारी चढ़ा देते हैं धान, टिकरा जमीन पर हो रही करोड़ों की ठगी

धान खरीदी के लिए पंजीयन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने गिरदावरी और मोबाइल ऐप से फोटो खींचने जैसी व्यवस्था लागू की है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर पटवारी और खरीदी केंद्र प्रभारियों की मिलीभगत से बड़ा खेल होता है। अक्सर किसान अपनी उपजाऊ जमीन पर तो धान बोते हैं, लेकिन ‘टिकरा’ (ऊंची या कम उपजाऊ) जमीन को खाली छोड़ देते हैं या वहां दलहन-सब्जी उगाते हैं। बिचौलिए और पटवारी मिलकर इसी टिकरा जमीन का पंजीयन धान की फसल के नाम पर कर देते हैं। किसान को भनक भी नहीं लगती और उसके नाम पर फर्जी धान की एंट्री सिस्टम में कर दी जाती है।

पड़ोसी राज्यों से तस्करी और मिलीभगत: सीमा पार से आता है सस्ता धान और छत्तीसगढ़ में खपता है ऊंचे दाम पर, बिचौलिए हो रहे मालामाल

छत्तीसगढ़ में धान का समर्थन मूल्य पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक है, जो तस्करों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है। ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे सीमावर्ती राज्यों से रात के अंधेरे में ट्रकों के जरिए घटिया दर्जे का धान छत्तीसगढ़ लाया जाता है। खरीदी केंद्रों के प्रभारी इस धान को स्थानीय किसानों के नाम पर खपा देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अफसर से लेकर कोचिए तक शामिल होते हैं, जिससे फर्जी धान की मात्रा वास्तविक उत्पादन से कहीं ऊपर निकल जाती है। बीते साल के आंकड़े बताते हैं कि 149 लाख मीट्रिक टन की खरीदी में से करीब एक-तिहाई हिस्सा संदिग्ध हो सकता है।

दो केंद्रों में ही गायब मिला 7 करोड़ का धान, सीसीटीवी और दस्तावेजों से छेड़छाड़ कर मिटाए सबूत

धान खरीदी में अनियमितता का सबसे ताजा उदाहरण कवर्धा जिले में देखने को मिला। बाजार चारभांठा और बघर्रा केंद्रों की जांच में पता चला कि वहां रिकॉर्ड के मुकाबले करीब 26 हजार क्विंटल धान कम था। बाजार में इस धान की कीमत करीब 7 करोड़ रुपये आंकी गई है। जांच टीम ने पाया कि वहां न केवल फर्जी बिल और एंट्री की गई थी, बल्कि मजदूरों की हाजिरी तक झूठी भरी गई थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पकड़े जाने के डर से वहां लगे सीसीटीवी कैमरों के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी ताकि धान की आवाजाही का कोई पुख्ता सबूत न मिल सके।

जिलाखरीदी केंद्रअनुमानित घाटा (रुपये में)पकड़ी गई अनियमितता
कवर्धाबाजार चारभांठालगभग 3.5 करोड़धान की भौतिक कमी, फर्जी बिल
कवर्धाबघर्रालगभग 3.5 करोड़सीसीटीवी से छेड़छाड़, फर्जी एंट्री
प्रदेश स्तरसामान्य (अनुमानित)10,000 करोड़ सालानारिसाइकिलिंग, तस्करी, फर्जी रकबा

मिलर्स और रिसाइकिलिंग का मायाजाल: मिल से निकलने वाला चावल फिर बन जाता है धान, सरकारी पैसे की बंदरबांट का सबसे बड़ा जरिया

धान घोटाले का सबसे खतरनाक हिस्सा है ‘रिसाइकिलिंग’। इसमें राइस मिलर्स को जो धान कुटाई के लिए दिया जाता है, उसका एक हिस्सा वे सीधे बाजार में बेच देते हैं या पुराने चावल को वापस खरीदी केंद्र भेज देते हैं। वही चावल फिर से नए धान के रूप में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो जाता है। कागजों में तो धान की खरीदी और मिलिंग दिखती रहती है, लेकिन वास्तव में वही पुराना अनाज बार-बार सरकारी गोदामों के चक्कर काटता रहता है। इस चक्र में सरकार हर बार नए धान की कीमत और मिलिंग का पैसा चुकाती है, जो सीधा भ्रष्ट सिंडिकेट की जेब में जाता है।

सख्त निगरानी की दरकार: क्या रुक पाएगा सरकारी खजाने का रिसाव? तकनीक और ईमानदारी के मेल से ही संभव है सुधार

हालांकि सरकार ने बायोमेट्रिक और जीपीएस ट्रैकिंग जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन जब तक जमीनी स्तर के अमले की जवाबदेही तय नहीं होगी, यह खेल रुकना मुश्किल है। धान खरीदी के इस ‘चमत्कार’ को रोकने के लिए रैंडम फिजिकल वेरिफिकेशन (अचानक जांच) और दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जरूरत है। अगर सरकार इस 10 हजार करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार को रोकने में सफल होती है, तो यह पैसा राज्य के विकास और वास्तविक किसानों के कल्याण में लगाया जा सकता है। फिलहाल, बस्तर से लेकर सरगुजा तक धान का यह खेल बदस्तूर जारी है।

Also Read: छत्तीसगढ़ में धान का ‘अजीब’ घोटाला: 7 करोड़ का 26 हजार क्विंटल धान गायब, अफसरों ने चूहों और दीमकों पर फोड़ा ठीकरा

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button