
De-listing: इन दिनों देश के राजनीतिक गलियारों और जनजातीय समाज के बीच ‘डी-लिस्टिंग’ शब्द को लेकर भारी हलचल मची हुई है। दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में देश भर से जुटे करीब तीन लाख आदिवासियों ने इस मांग को लेकर एक विशाल रैली का आयोजन किया था। इस महासम्मेलन में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय समेत राज्य के कई वरिष्ठ आदिवासी नेता और करीब दस हजार लोग शामिल हुए। आसान शब्दों में कहें तो इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सरकारी सूची से उन लोगों के नाम हटाना है जो अपना मूल धर्म और पारंपरिक संस्कृति छोड़कर किसी अन्य धर्म में शामिल हो चुके हैं। इस आंदोलन ने बस्तर के जंगलों से लेकर देश की राजधानी तक एक नई बहस छेड़ दी है।
क्या है ‘जनजातीय सुरक्षा मंच’ और क्यों हो रही है दोहरे लाभ पर रोक लगाने की मांग
Demand Of Delisting: इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन की कमान संभाल रहे ‘जनजातीय सुरक्षा मंच’ ने सरकार के सामने दो प्रमुख मांगें रखी हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि जो आदिवासी अपनी पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज, प्रकृति पूजा और पूर्वजों के तौर-तरीकों को पूरी तरह त्याग कर दूसरा धर्म अपना चुके हैं, उन्हें आदिवासी को मिलने वाले विशेष आरक्षण के कोटे से तुरंत बाहर किया जाना चाहिए। नेताओं का तर्क है कि धर्म बदलने वाले लोग एक तरफ तो अल्पसंख्यक होने के नाते सरकारी योजनाओं और छात्रवृत्तियों का फायदा उठाते हैं और दूसरी तरफ आदिवासी होने के नाते नौकरियों में भी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। इस दोहरे फायदे की व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए।

समझिए 18% और 82% का पूरा सामाजिक गणित, क्यों पीछे छूट रहा है मूल समाज
आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे सामाजिक संगठनों ने इस पूरे विवाद की जड़ को कुछ आंकड़ों के जरिए स्पष्ट किया है। नेताओं के मुताबिक सामाजिक और आर्थिक असमानता का यह पूरा गणित इस प्रकार है:
- 18 प्रतिशत आबादी का मतांतरण: देश और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में लगभग 18 फीसदी लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपना मूल धर्म बदल लिया है।
- 80 प्रतिशत लाभ पर कब्जा: यह वर्ग बेहतर शिक्षा, जागरूकता और आधुनिक पहुंच के कारण सरकारी नौकरियों, कॉलेज की सीटों और अन्य विभागीय योजनाओं का लगभग 80 प्रतिशत लाभ अकेले ही प्राप्त कर लेता है।
- 82 प्रतिशत मूल समाज वंचित: दूसरी तरफ जो 82 फीसदी पारंपरिक आदिवासी आज भी सुदूर जंगलों और गांवों में रहकर अपनी पुरानी संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और पूर्वजों की परंपराओं को बचाए हुए हैं, वे आज भी बेहद पिछड़े हैं और उनके हिस्से में केवल 20 प्रतिशत लाभ ही पहुंच पाता है।
बस्तर के नेताओं का गंभीर आरोप, विदेशी पैसों और लालच के दम पर हो रहा है धर्म परिवर्तन
बस्तर के सांसद महेश कश्यप और वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े रामनाथ कश्यप ने अंदरूनी क्षेत्रों के हालातों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। आदिवासी नेताओं का कहना है कि सुदूर वनांचल के भोले-भाले इलाकों में कुछ बाहरी मिशनरियों द्वारा विदेशी फंडिंग के दम पर, मुफ्त सेवा और पैसों का लालच देकर बड़े पैमाने पर मतांतरण का जाल बिछाया जा रहा है। उनका कहना है कि किसी भी आदिवासी की पहचान केवल उसकी जाति के नाम से नहीं बल्कि उसकी विशिष्ट जीवन शैली, प्रकृति पूजा और स्थानीय देवी-देवताओं से होती है। जब किसी व्यक्ति ने अपनी मूल पहचान और पूर्वजों की परंपरा को ही छोड़ दिया, तो वह आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों का हकदार कैसे बना रह सकता है।

संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति के लिए बनाए थे कड़े नियम, जानिए क्या था बाबासाहेब का कानून
अब यह तकनीकी सवाल खड़ा होता है कि इस मांग को पूरा करने के लिए देश के कानून में बदलाव करना क्यों अनिवार्य हो गया है। दरअसल इसके पीछे भारतीय संविधान का एक पुराना कानूनी पेंच है जिसे समझना जरूरी है:
- अनुसूचित जाति (SC) के लिए नियम: संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अनुसूचित जाति के वर्ग के लिए बेहद स्पष्ट और कड़ा नियम बनाया था कि यदि कोई दलित व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा कोई अन्य धर्म अपनाता है, तो उसका आरक्षण का अधिकार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।
- अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए छूट: संविधान निर्माण के समय अनुच्छेद 342 के तहत आदिवासी समाज के लिए ऐसी कोई धार्मिक बंदिश नहीं लगाई गई थी, जिसके कारण धर्म बदलने के बाद भी लोग कानूनी रूप से इस आरक्षण का लाभ उठाने के योग्य बने हुए हैं।
अनुच्छेद 342 में संशोधन चाहती है संसद से मांग, एससी वर्ग की तरह कड़े नियम बनाने पर जोर
आंदोलनकारी चाहते हैं कि केंद्र सरकार संसद में एक विशेष विधेयक लाकर संविधान के अनुच्छेद 342 में जरूरी संशोधन करे। उनकी मांग है कि एसटी वर्ग के लिए भी वही कड़ा कानूनी नियम लागू किया जाए जो वर्तमान में एससी वर्ग के लिए प्रभावी है। देश भर से दिल्ली पहुंचे आदिवासी प्रतिनिधियों का मानना है कि केंद्र की मौजूदा सरकार कड़े और ऐतिहासिक फैसले लेने के लिए जानी जाती है। जिस मजबूत इच्छाशक्ति के साथ सरकार ने पूर्व में कड़े कदम उठाए हैं, उसी तरह वह मूल आदिवासियों के अस्तित्व की रक्षा के लिए डी-लिस्टिंग का कानून भी जरूर बनाएगी।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से बची है समाज को आखिरी उम्मीद, मूल संस्कृति को बचाने की जंग तेज
दिल्ली के महासम्मेलन में शामिल आदिवासी प्रतिनिधियों ने देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का विशेष जिक्र करते हुए अपनी उम्मीदें जताई हैं। नेताओं का कहना है कि चूंकि देश की वर्तमान राष्ट्रपति स्वयं एक साधारण आदिवासी समाज से निकलकर इस शीर्ष पद तक पहुंची हैं, इसलिए वे सुदूर अंचलों में रहने वाले मूल आदिवासियों के इस वास्तविक दर्द और उनके अधिकारों के हनन की समस्या को अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकती हैं। लाल किला मैदान से उठी यह गूंज अब छत्तीसगढ़ के बस्तर, सरगुजा से लेकर देश के नीति नियंताओं के बीच चर्चा का मुख्य विषय बन चुकी है।



