मुस्लिम संपत्ति कानून पर हाईकोर्ट की अहम व्याख्या

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत वसीयत को लेकर एक बड़ा और स्पष्ट फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का केवल एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए दे सकता है। इससे अधिक हिस्से की वसीयत तभी मान्य होगी, जब सभी कानूनी वारिस अपनी स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति दें। बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत को कानूनन गलत माना जाएगा।

वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर

यह फैसला इस्लामी कानून के उस मूल सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसमें वारिसों के हक की रक्षा को प्राथमिकता दी गई है। जस्टिस बिभु दत्तगुरु की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि निचली अदालतों ने गंभीर कानूनी चूक की थी। उन्होंने विधवा को उसके वैधानिक हिस्से से पूरी तरह वंचित कर दिया था, जो कानून के खिलाफ है।

कोरबा की विधवा जैबुन निशा का मामला

यह पूरा विवाद कोरबा जिले की रहने वाली 64 वर्षीय जैबुन निशा से जुड़ा है। वह दिवंगत अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं। अब्दुल सत्तार का निधन 19 मई 2004 को हुआ था। उनके नाम पर कोरबा शहर में खसरा नंबर 1045/3 की लगभग आठ डिसमिल जमीन और उस पर बना मकान था। यह संपत्ति उनकी निजी मानी जाती है और उनकी कोई संतान नहीं थी।

भतीजे ने पेश की पूरी संपत्ति की वसीयत

अब्दुल सत्तार की मृत्यु के बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने खुद को उनका गोद लिया हुआ बेटा बताते हुए पूरी संपत्ति पर दावा किया। सिकंदर ने 27 अप्रैल 2004 की एक वसीयत पेश की, जिसमें कथित तौर पर अब्दुल सत्तार ने पूरी संपत्ति उसके नाम कर दी थी। इसके आधार पर सिकंदर ने तहसीलदार के सामने आवेदन देकर राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम जैबुन निशा के साथ जुड़वा लिया। 7 दिसंबर 2004 को तहसीलदार ने दोनों के नाम दर्ज करने का आदेश दे दिया।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट से राहत

जैबुन निशा का कहना था कि उन्हें इस पूरे मामले की जानकारी नवंबर 2007 में हुई। उन्होंने वसीयत को फर्जी और मुस्लिम कानून के खिलाफ बताया और कहा कि यह उनकी सहमति के बिना बनाई गई है। इसके बाद उन्होंने 2014 में सिविल जज कोरबा की अदालत में मुकदमा दायर किया, लेकिन ट्रायल कोर्ट और फिर जिला अदालत से उन्हें राहत नहीं मिली। अंततः हाईकोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के फैसले रद्द करते हुए साफ कर दिया कि वसीयत के आधार पर एक तिहाई से ज्यादा संपत्ति नहीं दी जा सकती और विधवा को उसके कानूनी हक से वंचित नहीं किया जा सकता।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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