डाकघर बचत घोटाला: करोड़ों की हेराफेरी के बाद विजिलेंस अधिकारी पर गिरी गाज, उपभोक्ता आयोग ने सुनाया सख्त फैसला

रायपुर के रविशंकर विश्वविद्यालय परिसर स्थित उप डाकघर में हुए करोड़ों के बचत घोटाले ने डाक विभाग की चूलें हिला दी हैं। राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा पीड़ितों के पक्ष में फैसला सुनाए जाने के बाद विभाग ने अपनी पहली बड़ी गाज विजिलेंस विंग पर गिराई है। विभाग में मचे हड़कंप के बीच विजिलेंस अधिकारी को हटाकर नई नियुक्तियां की गई हैं। भ्रष्टाचार और लापरवाही को लेकर विभाग की साख पर उठ रहे सवालों के बीच प्रशासन अब डैमेज कंट्रोल में जुट गया है।

पूजा तिवारी बनीं नई विजिलेंस अधिकारी

डाक विभाग के प्रधान डाक निदेशक (PMG) अजय सिंह चौहान ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संभागीय और परिमंडल कार्यालयों में सघन जांच शुरू कर दी है। इसी कड़ी में परिमंडल कार्यालय के विजिलेंस विंग में फेरबदल करते हुए वरिष्ठ पोस्ट मास्टर पूजा तिवारी को एएसपी विजिलेंस के पद पर नियुक्त किया गया है। विभाग ने यह कदम उपभोक्ता आयोग के उस आदेश के बाद उठाया है जिसमें सिस्टम की कमियों और निगरानी में विफलता को प्रमुख कारण माना गया था।

एजेंट और कर्मचारियों की साठगांठ का पर्दाफाश

राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपनी सुनवाई में बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि डाक एजेंट और विभागीय कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा फर्जीवाड़ा मुमकिन ही नहीं था। आयोग ने पाया कि एजेंटों ने पोस्टमास्टर के साथ मिलकर खाताधारकों की मेहनत की कमाई को चूना लगाया। जांच में सामने आया कि नियमों को ताक पर रखकर खातों से पैसे निकाले गए और विभाग के जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए रहे।

1.97 करोड़ रुपये के निवेश में हुई धोखाधड़ी

यह पूरा मामला अनिल कुमार पाण्डेय और उनके परिवार से जुड़ा है। उन्होंने साल 2016 से 2020 के बीच एजेंट भूपेंद्र पाण्डेय और आकांक्षा पाण्डेय के जरिए रविशंकर विश्वविद्यालय डाकघर में 19 फिक्स्ड डिपॉजिट (TDR) और 2 आरडी खाते खुलवाए थे। इन खातों में परिवार ने करीब 1.97 करोड़ रुपये की बड़ी राशि निवेश की थी। पीड़ितों को फर्जी पासबुक और रसीदें थमाकर यह विश्वास दिलाया गया कि उनकी रकम पूरी तरह सुरक्षित है।

फर्जी दस्तखत और जाली पासबुक का जाल

घोटालेबाजों ने पीड़ितों से निवेश के प्रपत्रों पर हस्ताक्षर तो कराए, लेकिन उन पैसों को सरकारी खातों में जमा करने के बजाय खुद हड़प लिया। पीड़ितों को जो पासबुक दी गई थीं, उन पर डाकघर की आधिकारिक मुहर और पोस्टमास्टर के फर्जी हस्ताक्षर मौजूद थे। जब पीड़ितों को धोखाधड़ी का शक हुआ और उन्होंने विभाग से शिकायत की, तब भी अधिकारियों ने संदिग्ध खातों को होल्ड करने की जहमत नहीं उठाई। इसी लापरवाही ने घोटाले को और बड़ा बना दिया।

उपभोक्ता आयोग ने लगाई विभाग को फटकार

न्याय न मिलने पर पीड़ित परिवार ने न्यायमूर्ति गौतम चौरड़िया और सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की पीठ के समक्ष गुहार लगाई। आयोग ने सभी दस्तावेजों और पासबुकों का बारीकी से परीक्षण किया। पीठ ने स्पष्ट कहा कि डाक विभाग अपनी सेवा में कमी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। डाकघर की मुहर और पोस्टमास्टर के हस्ताक्षरों का दुरुपयोग विभाग के आंतरिक कंट्रोल की विफलता को दर्शाता है। आयोग ने माना कि विभाग ने संदिग्ध एजेंट के खिलाफ समय पर कार्रवाई न करके पीड़ितों को आर्थिक और मानसिक चोट पहुंचाई है।

1.91 करोड़ रुपये लौटाने का ऐतिहासिक आदेश

आयोग ने साक्ष्यों के आधार पर डाक विभाग को कड़ा आदेश देते हुए 45 दिनों के भीतर पीड़ितों को 1 करोड़ 91 लाख 39 हजार 965 रुपये का भुगतान करने को कहा है। इसके साथ ही 20 नवंबर 2023 से भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत का वार्षिक ब्याज भी देना होगा। आयोग ने पीड़ित परिवार को हुए मानसिक तनाव के लिए 1 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति और 15 हजार रुपये कानूनी खर्च के तौर पर अदा करने का भी निर्देश दिया है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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