शिकारियों से नहीं अब कुत्तों से खतरा: अंबिकापुर में 15 हिरणों की मौत के बाद जागा प्रशासन, जंगलों में ‘नो एंट्री’

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में पिछले दिनों एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जहां आवारा कुत्तों के झुंड ने बाड़े में घुसकर 15 शाकाहारी वन्यप्राणियों को मौत के घाट उतार दिया। इस भीषण शिकार के बाद नींद से जागे वन विभाग ने अब प्रदेशभर के जंगलों और अभयारण्यों में सख्त घेराबंदी शुरू कर दी है। विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि अब वन्यजीव क्षेत्रों में आवारा कुत्तों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। प्रधान मुख्य वन संरक्षक अरुण कुमार पाण्डेय ने सभी क्षेत्रीय अधिकारियों को पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल कार्रवाई करने और वन्यजीवों की सुरक्षा पुख्ता करने के आदेश दिए हैं।

संजय वाटिका की घटना से सबक: बाड़े में घुसकर किया था 15 वन्यजीवों का शिकार

सरगुजा वनमंडल के अंबिकापुर स्थित संजय वाटिका में 20 और 21 मार्च की दरमियानी रात आवारा कुत्तों ने सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए बाड़े में प्रवेश किया था। कुत्तों के हमले में 15 हिरण और अन्य शाकाहारी जीवों की जान चली गई। इस घटना ने वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की गई है। इसी जांच के शुरुआती नतीजों के बाद अब पूरे प्रदेश के संवेदनशील वन क्षेत्रों को ‘डॉग फ्री जोन’ बनाने की तैयारी शुरू हो गई है।

एसओपी पर जोर: अगले दो हफ्तों में कर्मचारियों को दी जाएगी खास ट्रेनिंग

वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए अब राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा तय की गई मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी का कड़ाई से पालन किया जाएगा। वन विभाग ने तय किया है कि अगले दो सप्ताह के भीतर सभी रेंजरों और मैदानी कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस ट्रेनिंग में उन्हें बताया जाएगा कि वन्यजीव क्षेत्रों की सीमाओं पर कुत्तों की निगरानी कैसे करनी है और आपात स्थिति में किस तरह से उन्हें इंसानी बस्तियों की ओर खदेड़ना है।

पालतू कुत्तों के लिए कलर कोडिंग: पट्टे से होगी मालिक की पहचान

जंगल के आसपास बसे गांवों के पालतू कुत्तों के लिए विभाग ने एक अनूठी योजना तैयार की है। अब इन गांवों के कुत्तों को विशेष रंग के कॉलर (पट्टे) पहनाए जाएंगे। इस कलर कोडिंग का उद्देश्य पालतू और आवारा कुत्तों के बीच अंतर करना है। यदि कोई पालतू कुत्ता बिना किसी निगरानी के वन क्षेत्र के भीतर पाया जाता है, तो उसके मालिक की पहचान कर नियमानुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इससे ग्रामीणों की अपने पालतू जानवरों के प्रति जिम्मेदारी भी तय होगी।

मानवीय तरीके से प्रबंधन: एनिमल वेलफेयर बोर्ड के नियमों का होगा पालन

वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि आवारा कुत्तों को पकड़ने की पूरी प्रक्रिया मानवीय होगी। इसके लिए ‘एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया’ (AWBI) के दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाएगा। कुत्तों को पकड़ते समय या उन्हें जंगल से बाहर ले जाते समय पशु क्रूरता का कोई भी मामला सामने न आए, इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा। विभाग का लक्ष्य वन्यजीवों को बचाना है, न कि किसी अन्य जानवर को अनावश्यक नुकसान पहुंचाना।

रैबीज का खतरा टलेगा: जंगल के किनारे बसे गांवों में चलेगा जागरूकता अभियान

कुत्तों के हमले से केवल शिकार का ही डर नहीं है, बल्कि जंगली जानवरों में रैबीज जैसी जानलेवा बीमारियां फैलने का भी बड़ा खतरा रहता है। इससे निपटने के लिए वन विभाग गांवों में पोस्टर, बैनर और ग्राम सभाओं के माध्यम से जन जागरूकता अभियान चलाएगा। ग्रामीणों को समझाया जाएगा कि वे अपने कुत्तों का टीकाकरण कराएं और उन्हें खुला न छोड़ें। यह अभियान वन्यजीवों और पालतू जानवरों, दोनों की सेहत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

समयबद्ध योजना: हर वनमंडल में ग्रामवार तैयार होगी लिस्ट

प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने सभी वनमंडलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले गांवों की सूची तैयार करें। प्रत्येक गांव के लिए एक समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाएगी ताकि अगले कुछ महीनों में वन क्षेत्रों के आसपास कुत्तों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके। इस पूरी कवायद का मकसद छत्तीसगढ़ के जंगलों को शाकाहारी वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित बसेरा बनाना है, जहां वे बिना किसी बाहरी शिकारी या आवारा जानवर के डर के रह सकें।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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