
Teejan Bai biography in Hindi: भारत की लोक कला परंपरा में यदि किसी कलाकार ने अपनी प्रतिभा, संघर्ष और समर्पण के बल पर विश्व स्तर पर पहचान बनाई है, तो उनमें तीजन बाई का नाम सबसे प्रमुख है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकगायन शैली पंडवानी को नई पहचान दिलाई और इसे देश-विदेश तक पहुंचाया। कठिन सामाजिक परिस्थितियों, पारिवारिक विरोध और आर्थिक अभावों के बावजूद उन्होंने कभी अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा। इसी अद्भुत योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया।

जन्म और प्रारंभिक जीवन
तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के अटारी गांव में पारधी समुदाय के एक साधारण परिवार में हुआ था। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकपर्व तीज के दिन हुआ था, इसलिए उनके माता-पिता ने उनका नाम “तीजन” रखा। कई जगह उनका जन्मदिन 24 अप्रैल बताया जाता है, लेकिन यह तथ्य सही नहीं माना जाता क्योंकि तीज का पर्व अप्रैल में नहीं पड़ता।
उनकी माता का नाम सुखवती देवी तथा पिता का नाम हुनुकलाल पारधी था। वे अपने माता-पिता की पहली संतान थीं। बचपन अत्यंत गरीबी और अभावों में बीता, लेकिन प्रकृति की आवाज़ें, मां के लोकगीत और पिता की बांसुरी ने उनके भीतर संगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा किया।

पारधी समुदाय से निकलकर बनाई नई पहचान
तीजन बाई पारधी समुदाय से आती हैं। यह समुदाय पारंपरिक रूप से वन्य जीवों का शिकार कर जीविका चलाता था। अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 के तहत पारधी समुदाय को अपराधी घोषित कर दिया था। हालांकि यह कानून 31 अगस्त 1952 को समाप्त कर दिया गया, लेकिन बाद में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 लागू होने से इस समुदाय की पारंपरिक आजीविका समाप्त हो गई और अधिकांश लोग मजदूरी करने लगे।
ऐसी परिस्थितियों वाले समाज से निकलकर तीजन बाई ने अपनी कला के दम पर पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।
पंडवानी गायन की शुरुआत
तीजन बाई जब छोटी थीं, तब उन्होंने अपने वृद्ध नाना को पंडवानी गाते हुए सुना। उनके गायन से वे इतनी प्रभावित हुईं कि उसी समय उन्होंने पंडवानी सीखने का निश्चय कर लिया।
महज 9 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। समाज और परिवार ने इसका कड़ा विरोध किया क्योंकि उस समय महिलाओं का पंडवानी गाना लगभग प्रतिबंधित माना जाता था। बावजूद इसके उन्होंने सीखना जारी रखा।

पंडवानी क्या है?
पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक प्रसिद्ध लोकगायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथा को गीत, संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इसका आधार कवि सबल सिंह चौहान द्वारा रचित महाभारत है।
इस प्रस्तुति में एक मुख्य कलाकार कथा सुनाता है और विभिन्न पात्रों का अभिनय भी करता है। उसके साथ पांच-छह कलाकारों की मंडली होती है, जिसमें रागी, हारमोनियम, तबला, मंजीरा, बैंजो और खंजेड़ी जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां
छत्तीसगढ़ में पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां प्रचलित हैं—
वेदमती शैली
इस शैली में कलाकार घुटनों के बल बैठकर शास्त्रीय परंपरा के अनुसार कथा का गायन करता है। इसमें कल्पना की अपेक्षा मूल कथा को अधिक महत्व दिया जाता है।
कापालिक शैली
इस शैली में कलाकार मंच पर खड़े होकर, चलते हुए और अभिनय करते हुए कथा प्रस्तुत करता है। इसमें कल्पना, संवाद और नाटकीय प्रस्तुति की अधिक स्वतंत्रता होती है।
तीजन बाई कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली पहली महिला कलाकार बनीं।

महिलाओं के लिए नई राह बनाई
लंबे समय तक पंडवानी केवल पुरुष कलाकारों की कला मानी जाती थी। सबसे पहले लक्ष्मीबाई बंजारे ने वेदमती शैली में और तीजन बाई ने कापालिक शैली में इस परंपरा को तोड़ते हुए महिलाओं के लिए नया रास्ता बनाया।
पहली प्रस्तुति और संघर्ष
तीजन बाई ने 13 वर्ष की आयु में चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। इस कार्यक्रम का आयोजन गांव के मालगुजार और कला प्रेमी भूषण लाल देशमुख ने कराया था।
उन्हें वाद्ययंत्रों के साथ पंडवानी प्रस्तुत करने का प्रशिक्षण उमेद सिंह देशमुख ने दिया, जिन्हें तीजन बाई जीवनभर अपना गुरु मानती रहीं।

पंडवानी के कारण टूटी शादी
पंडवानी गायन के कारण तीजन बाई को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। उन्हें घर से निकाल दिया गया और उनकी पहली शादी भी इसी कारण टूट गई। दूसरी शादी में भी यही समस्या बनी रही।
इसके बावजूद उन्होंने कभी अपनी कला नहीं छोड़ी और लगातार अभ्यास करती रहीं। यही समर्पण आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
मंच पर साहस का परिचय
एक बार मंच पर प्रस्तुति के दौरान उनके पति ने सार्वजनिक रूप से अभद्र व्यवहार किया। उस समय तीजन बाई ने तंबूरा उठाकर दृढ़ता से कहा कि उन्होंने केवल उनका ही नहीं बल्कि उनकी कला और मंच का भी अपमान किया है। उसी क्षण उन्होंने अपने पति से संबंध समाप्त करने का निर्णय ले लिया।
यह घटना उनके आत्मसम्मान और कला के प्रति समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।

“महाभारत नहीं करती, महाभारत की कथा सुनाती हूं”
जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनका कार्यक्रम देखकर कहा कि वे “बहुत अच्छा महाभारत करती हैं”, तब तीजन बाई ने तुरंत मुस्कुराते हुए उत्तर दिया—
“महाभारत नहीं करती हूं, महाभारत की कथा सुनाती हूं।”
उनका यह उत्तर आज भी उनकी सादगी और कला के प्रति सम्मान का उदाहरण माना जाता है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान
चंदखुरी से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे भिलाई, रायपुर, दुर्ग और भोपाल तक पहुंचा। भोपाल के भारत भवन में प्रस्तुति के दौरान प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर उनकी प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने तीजन बाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का अवसर दिलाया।
बाद में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने उन्हें अपने धारावाहिक “भारत एक खोज” में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया, जिससे उनकी कला देशभर में लोकप्रिय हो गई।
भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी
उनकी असाधारण प्रतिभा को देखते हुए 1986 में भिलाई स्टील प्लांट ने उन्हें नौकरी प्रदान की। इससे उनके जीवन को आर्थिक स्थिरता मिली और वे अपनी कला को और अधिक समय दे सकीं।
प्रमुख सम्मान और पुरस्कार
तीजन बाई को देश और विदेश में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
- 1988 – पद्मश्री
- 1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
- 2003 – पद्म भूषण
- 2018 – फुकुओका पुरस्कार
- 2019 – पद्म विभूषण
इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय ने वर्ष 2003 तथा पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने वर्ष 2006 में उन्हें डी.लिट्. (मानद उपाधि) प्रदान की।
समाज सेवा और महिला सशक्तिकरण
औपचारिक शिक्षा प्राप्त न कर पाने के बावजूद तीजन बाई ने साक्षरता अभियान, महिला अधिकार और लोक कला संरक्षण से जुड़े अनेक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई। लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं के निर्माण और प्रचार-प्रसार में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयां
तीजन बाई का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। तीन जीवनसाथियों ने उनका साथ छोड़ा। उन्होंने सामाजिक तिरस्कार झेला और अपने दो पुत्रों तथा एक दत्तक पुत्री को खोने का गहरा दुख भी सहा। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी पंडवानी का अभ्यास नहीं छोड़ा।
कला की विशेषता
तीजन बाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी प्रभावशाली आवाज़, अद्भुत अभिनय, कथा को याद रखने की क्षमता और मंच पर जीवंत प्रस्तुति है। वे महाभारत की कथा सुनाते समय पात्रों के भावों को इतनी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं कि दर्शक पूरी तरह कथा में डूब जाते हैं।
वरिष्ठ कला समीक्षकों के अनुसार, उनके गायन में वीर रस, करुण रस, वात्सल्य, हास्य, क्रोध और सामाजिक व्यंग्य का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे पारंपरिक कथा के साथ समकालीन सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी सहज टिप्पणी करती हैं।

पसंद और व्यक्तित्व
तीजन बाई को फिल्मों का भी विशेष शौक रहा है। उनके पसंदीदा अभिनेता अमिताभ बच्चन हैं और वे अक्सर उनका लोकप्रिय गीत “मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है” गुनगुनाती रहती हैं। उनकी सादगी, सहजता और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण ने उन्हें लाखों लोगों का प्रिय कलाकार बनाया।
“पंडवानी ही मेरा बेड़ा पार लगाएगी”
जीवन के अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बावजूद तीजन बाई का अपनी कला के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ। एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था—
“जैसे बंदर का बच्चा अपनी मां को कसकर पकड़ता है, वैसे ही मैंने पंडवानी को पकड़ रखा है। पंडवानी ही मेरा बेड़ा पार लगाएगी।”
यह कथन उनके पूरे जीवन का सार प्रस्तुत करता है।

तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति की जीवंत पहचान हैं। उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया और यह साबित किया कि प्रतिभा, साहस और समर्पण के सामने हर बाधा छोटी पड़ जाती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, आत्मविश्वास और संस्कृति संरक्षण की प्रेरणादायक मिसाल है।
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