
हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में समय की गणना का विशेष महत्व है, और इसी कड़ी में आगामी 14 मार्च से ‘खरमास’ का प्रारंभ होने जा रहा है। जब सूर्य देव अपने भ्रमण के दौरान देवगुरु बृहस्पति की राशियों (धनु या मीन) में प्रवेश करते हैं, तो उस अवधि को खरमास या ‘धनुर्मास’ कहा जाता है। इस वर्ष सूर्य 14 मार्च को मीन राशि में गोचर करेंगे, जिससे मांगलिक कार्यों पर एक महीने के लिए रोक लग जाएगी। धार्मिक दृष्टि से इस समय को भौतिक सुखों के बजाय आध्यात्मिक उन्नति, जप-तप और आत्मचिंतन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
मीन संक्रांति के साथ खरमास का आगाज़ और तिथियां
वैदिक पंचांग के अनुसार, साल का दूसरा खरमास चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि से शुरू होकर वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि तक प्रभावी रहेगा। इससे पहले दिसंबर से जनवरी के मध्य धनु राशि के खरमास का प्रभाव रहा था। 14 मार्च को सूर्य के मीन राशि में प्रवेश करते ही गुरु की राशि में सूर्य के होने से गुरु का प्रभाव कम हो जाता है, जिसे ज्योतिषीय भाषा में शुभ कार्यों के लिए ‘वर्जित काल’ माना जाता है। अब अगले एक महीने तक शहनाइयों की गूंज शांत रहेगी और नए संकल्पों के लिए शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा करनी होगी।
मांगलिक कार्यों पर पाबंदी: विवाह और गृह प्रवेश वर्जित
खरमास की अवधि में हिंदू धर्म के प्रमुख 16 संस्कारों और शुभ कार्यों को संपन्न करना वर्जित माना गया है। मान्यता है कि इस समय किए गए मांगलिक कार्यों का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। प्रमुख वर्जित कार्य इस प्रकार हैं:
- विवाह संस्कार: इस दौरान विवाह करना अशुभ माना जाता है क्योंकि गुरु की शक्ति क्षीण होने से दांपत्य जीवन में भावनात्मक दूरियां और परेशानियां आने की आशंका रहती है।
- भवन निर्माण व प्रवेश: नए घर की नींव रखना या गृह प्रवेश जैसे उत्सव इस एक माह तक टाल दिए जाते हैं।
- संस्कार कार्य: मुंडन, जनेऊ (यज्ञोपवीत) और नामकरण जैसे महत्वपूर्ण संस्कार भी इस अवधि में नहीं किए जाते।
नए व्यवसाय और निवेश की शुरुआत से बचने की सलाह
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, खरमास के दौरान किसी भी नए व्यावसायिक प्रतिष्ठान का शुभारंभ या बड़ा आर्थिक निवेश करना फलदायी नहीं माना जाता। ऐसी मान्यता है कि इस समय शुरू किए गए कार्यों में बाधाएं अधिक आती हैं और आर्थिक हानि की संभावना बनी रहती है। यह समय किसी भी नई भौतिक योजना को क्रियान्वित करने के बजाय पुरानी योजनाओं की समीक्षा करने और धैर्य बनाए रखने का है। शुभ मुहूर्त के अभाव में किसी भी अचल संपत्ति की खरीद-बिक्री से भी परहेज करना उचित बताया गया है।
आध्यात्मिक लाभ: पवित्र स्नान और दीपदान का महत्व
भले ही खरमास भौतिक कार्यों के लिए शुभ न हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह अत्यंत पुण्यदायी महीना है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार:
- नदी स्नान: इस दौरान ब्रह्ममुहूर्त में पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, नर्मदा) में स्नान करने से व्यक्ति के संचित पापों का नाश होता है।
- सूर्य उपासना: भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य देना और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना विशेष कृपा दिलाता है।
- दीपदान: संध्या काल में नदी किनारे या मंदिर में दीपदान करना सुख-समृद्धि प्रदायक माना गया है।
- दान-पुण्य: इस महीने में ब्राह्मणों और निर्धनों को अन्न-वस्त्र का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
संयम, साधना और आत्मचिंतन का विशेष काल
खरमास हमें सिखाता है कि जीवन में केवल भागदौड़ और भौतिक सुख ही सब कुछ नहीं हैं। यह एक महीना हमें रुककर अपनी अंतरात्मा की ओर मुड़ने का अवसर देता है। विद्वानों का मत है कि इस अवधि में अधिक से अधिक समय ईश्वर की भक्ति, मंत्र जाप और साधना में व्यतीत करना चाहिए। सात्विक भोजन ग्रहण करना और मन में शुद्ध विचार रखना इस समय की मुख्य साधना है। जैसे ही सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करेंगे, पुनः मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाएगी और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा।
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