
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का राजीव गांधी चौक शनिवार को नारों से गूंज उठा। संघर्षशील आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका यूनियन और छत्तीसगढ़ मितानिन आशा यूनियन (AIUTUC) के आह्वान पर सैकड़ों महिलाओं ने एक दिवसीय धरना प्रदर्शन किया। चिलचिलाती धूप की परवाह किए बिना ये महिलाएं अपनी मांगों को लेकर सड़क पर बैठी रहीं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे सालों से शासन की योजनाओं को जमीन पर उतार रही हैं लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ आश्वासन और मामूली मानदेय मिल रहा है।
वेतन वृद्धि और सरकारी दर्जे पर अड़ी महिलाएं
यूनियन की मुख्य मांग है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 24,000 रुपये और सहायिकाओं को 21,000 रुपये मासिक मानदेय दिया जाए। प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने साफ कहा कि अब वे केवल मानदेय पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं बल्कि उन्हें शासकीय कर्मचारी का दर्जा मिलना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाओं की भी जोरदार वकालत की। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि बढ़ती महंगाई में वर्तमान मानदेय से घर चलाना नामुमकिन हो गया है।
बढ़ता काम और मामूली मानदेय का दर्द
AIUTUC के राज्य प्रभारी विश्वजीत हारोडे ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कहा कि 1975 में शुरू हुई इस योजना का विस्तार तो बहुत हुआ लेकिन कर्मचारियों की हालत नहीं सुधरी। आज भी कार्यकर्ता 10,000 और सहायिका मात्र 5,000 रुपये में काम करने को मजबूर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में काम का बोझ तीन से चार गुना बढ़ गया है लेकिन मेहनताना वहीं का वहीं है। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि समाज के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से की सेवा करने वाली इन महिलाओं के लिए कोई ठोस कानून क्यों नहीं बनाया जा रहा।
अदालती आदेशों की अनदेखी का आरोप
संघर्षशील यूनियन की अध्यक्ष कल्पना चंद ने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में ही ग्रेच्युटी देने का स्पष्ट आदेश दिया था। वहीं गुजरात हाईकोर्ट ने भी कार्यकर्ताओं को तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मानकर सम्मानजनक वेतन देने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि अन्य राज्यों में इन आदेशों पर अमल शुरू हो गया है लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार अब भी मौन है। इन महिलाओं का कहना है कि जब देश की सर्वोच्च अदालत उनके पक्ष में है तो राज्य सरकार देरी क्यों कर रही है।
मितानिनों ने भी उठाई अपनी मांगें
प्रदर्शन में शामिल मितानिनों की मांगों को रखते हुए बबीता सोना और नीरा देवी ने कहा कि उनका मानदेय बढ़ाकर 10,000 रुपये किया जाना चाहिए। उनकी प्रमुख मांगों में राज्यांश को 100 प्रतिशत करना और प्रोत्साहन राशि को दोगुना करना शामिल है। मितानिनों ने मांग की है कि रिटायरमेंट पर उन्हें एकमुश्त 5 लाख रुपये की सहायता दी जाए ताकि उनका बुढ़ापा सुरक्षित हो सके। साथ ही दावा-पत्र के सभी तकनीकी बिंदुओं पर पारदर्शी तरीके से भुगतान की मांग भी उठाई गई।
ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की रीढ़ हैं ये महिलाएं
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और मितानिनें छत्तीसगढ़ के ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण ढांचे की असली रीढ़ हैं। टीकाकरण अभियान से लेकर कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ बनाने तक में इनकी भूमिका सबसे अहम होती है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार की हर छोटी-बड़ी सर्वे रिपोर्ट इन्हीं के जरिए तैयार होती है। बावजूद इसके उन्हें ‘स्वयंसेवी’ बताकर उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है। महिलाओं का कहना है कि जब जिम्मेदारी सरकारी है तो दर्जा भी सरकारी होना चाहिए।
मांगें न मानने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी
धरने के अंत में यूनियन नेताओं ने सरकार को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह एक दिवसीय धरना सिर्फ एक चेतावनी है। यदि शासन उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं करता और जल्द ही कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता तो आने वाले समय में यह आंदोलन और भी उग्र रूप लेगा। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे अब आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हैं और अपनी मांगों को मनवाने के लिए पूरे प्रदेश में काम बंद कर हड़ताल करने से भी पीछे नहीं हटेंगी।



