
छत्तीसगढ़ के 1538 अतिथि शिक्षकों के सब्र का बांध अब टूट गया है। लंबे समय से नियमितीकरण और बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे इन शिक्षकों ने अब सीधे राजभवन का दरवाजा खटखटाया है। अपनी मांगों को लेकर लगातार हो रही अनदेखी और स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के हालिया बयान से आहत होकर शिक्षकों ने राज्यपाल को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु तक की गुहार लगाई है। शिक्षकों का कहना है कि वे वर्षों से मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेल रहे हैं और अब उनके पास जीवन का कोई और रास्ता नहीं बचा है।
मंत्री के बदलते सुर: कल तक जो समर्थन में थे, आज गिना रहे नियम
अतिथि शिक्षकों की सबसे बड़ी नाराजगी स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के यू-टर्न को लेकर है। साल 2023 में जब भाजपा विपक्ष में थी, तब दुर्ग के विधायक के रूप में गजेंद्र यादव ने खुद स्कूल शिक्षा सचिव को पत्र लिखकर इन शिक्षकों को नियमित करने की सिफारिश की थी। लेकिन अब जब वे खुद विभाग के मंत्री हैं, तो वे तकनीकी नियमों का हवाला दे रहे हैं। अतिथि शिक्षक संघ की प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा पाण्डेय का कहना है कि जो नेता विपक्ष में रहकर हमारी मांगों को जायज बताते थे, सत्ता में आते ही उनकी भाषा पूरी तरह बदल गई है।
‘मोदी की गारंटी’ पर सवाल: 100 दिन का वादा निकला अधूरा
चुनाव के समय भाजपा के कई बड़े नेताओं ने अतिथि शिक्षकों के मंच पर जाकर उन्हें भरोसा दिलाया था। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग सांसद विजय बघेल ने भी उनके नियमितीकरण की वकालत की थी। यहाँ तक कि दुर्ग लोकसभा सांसद ने अपने वचनपत्र में यह लिखित वादा किया था कि सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर नियमितीकरण के लिए एक विशेष कमेटी बनाई जाएगी। अब सरकार बने महीनों बीत चुके हैं, लेकिन कमेटी तो दूर, उनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है।
विधानसभा में भारी हंगामा: ‘दैनिक वेतनभोगी’ नहीं मानने पर अड़ी सरकार
अतिथि शिक्षकों का मुद्दा हाल ही में विधानसभा में भी गूंजा। विपक्षी कांग्रेस विधायकों ने जब सरकार से ‘मोदी की गारंटी’ को लागू करने की बात पूछी, तो मंत्री गजेंद्र यादव ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अतिथि शिक्षक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए उनका नियमितीकरण संभव नहीं है। इस जवाब के बाद सदन में जबरदस्त शोर-शराबा हुआ। शिक्षकों का कहना है कि जब सरकार को काम लेना होता है तो वे शिक्षक हैं, लेकिन जब हक देने की बारी आती है तो उन्हें श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है।
वेतन घोटाले का शिकार: निजी कंपनियों ने की जमकर कमाई
अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति साल 2016 में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए की गई थी। शुरुआत में सरकार ने इस योजना का जिम्मा एक निजी कंपनी को सौंप दिया था। बाद में खुलासा हुआ कि यह कंपनी सरकार से मिलने वाली राशि का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा खुद रख लेती थी, जिससे कंपनी को सालाना 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा हो रहा था। बाद में कांग्रेस सरकार ने इस ठेका प्रथा को खत्म कर शिक्षकों को शाला विकास समिति के अधीन किया, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया।
दिन के हिसाब से कटती है सैलरी: 45 दिन का नहीं मिलता पैसा
अतिथि शिक्षकों के लिए कहने को तो 20 हजार रुपये मासिक वेतन तय है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। उन्हें दैनिक वेतन भोगी की तरह भुगतान किया जाता है। यदि शिक्षक किसी दिन उपस्थित नहीं हो पाता, तो उसके वेतन से 600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कटौती कर ली जाती है। सबसे बुरा हाल गर्मियों की छुट्टियों में होता है, जब स्कूल 45 दिनों के लिए बंद रहते हैं। इस अवधि में इन शिक्षकों को एक रुपया भी नहीं दिया जाता, जिससे उनके सामने परिवार पालने का संकट खड़ा हो जाता है।
छुट्टियों और भत्तों का अभाव: मातृत्व अवकाश से भी वंचित
अतिथि शिक्षकों ने अपनी प्रताड़ना का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें किसी भी प्रकार का अवकाश या भत्ता नहीं मिलता। महिला शिक्षकों की स्थिति और भी दयनीय है क्योंकि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) की सुविधा नहीं दी जा रही है। शिक्षकों का आरोप है कि उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जहां न तो काम के घंटे तय हैं और न ही सामाजिक सुरक्षा का कोई इंतजाम है।
ये हैं अतिथि शिक्षकों की प्रमुख मांगें
अतिथि शिक्षक संघ ने अपनी चार सूत्रीय मांगों को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा है। उनकी मांगों में साल के पूरे 12 महीने का वेतन देना, हर महीने 2 आकस्मिक अवकाश (CL) की पात्रता, कैशबुक का विधिवत संधारण और 10 साल की सेवा पूरी करने वाले सभी शिक्षकों का नियमितीकरण शामिल है। शिक्षकों ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार जल्द ही उनकी मांगों पर विचार नहीं करती है, तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
राजभवन से जवाब का इंतजार: क्या जगेगी उम्मीद की किरण?
फिलहाल लोकभवन से इन शिक्षकों को कोई ठोस आश्वासन या जवाब नहीं मिला है। शिक्षकों का यह दल राज्यपाल से व्यक्तिगत रूप से मिलकर अपना दुखड़ा सुनाना चाहता है। शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन खपा देने वाले इन 1538 परिवारों की नजरें अब राज्य सरकार और राज्यपाल के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या सरकार अपने पुराने वादों को निभाएगी या फिर इन शिक्षकों का संघर्ष और लंबा खिंचेगा, यह आने वाले समय में साफ होगा।



