
Kalratri Mata Puja: नवरात्रि के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन की कथा उन्हीं से जुड़ी है, जिन्होंने अपनी भयंकर शक्ति से रक्तबीज नामक महाबलशाली राक्षस का वध कर तीनों लोकों को शांति प्रदान की थी।

माँ कालरात्रि की पौराणिक कथा
Navratri Katha: पौराणिक कथा के अनुसार, असुरों के राजा शुंभ और निशुंभ का एक अत्यंत शक्तिशाली साथी था, जिसका नाम रक्तबीज था। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की एक भी बूँद यदि जमीन पर गिर जाए, तो उस बूँद से उसी के समान एक और दैत्य तुरंत जन्म ले लेगा। इस वरदान के कारण युद्ध में उसका वध करना असंभव हो गया था। रक्तबीज के इस अजेय रूप ने सभी देवी-देवताओं और मनुष्यों को बहुत परेशान किया, जिसके बाद सभी ने मिलकर माँ दुर्गा से प्रार्थना की।

Navratri 2025: देवताओं की प्रार्थना पर, माँ दुर्गा अत्यधिक क्रोधित हुईं और उन्होंने अपने तेज से देवी कालरात्रि को उत्पन्न किया। माँ कालरात्रि का रूप अत्यंत भयंकर था उनकी साँसों से आग निकलती थी, उनका वर्ण काला था और वह विकराल रूप में थीं।
जब युद्ध शुरू हुआ, तो माँ कालरात्रि ने रक्तबीज के वध के लिए एक अनोखी रणनीति अपनाई। जैसे ही माँ दुर्गा या अन्य देवी-देवता रक्तबीज पर प्रहार करते, उसके शरीर से रक्त बहने लगता। इससे पहले कि रक्त की कोई बूँद जमीन पर गिरती और नए दैत्य पैदा होते, माँ कालरात्रि उस समस्त रक्त को अपने मुख में भर लेती थीं।
इस तरह, रक्तबीज की एक भी बूँद जमीन पर नहीं गिरी और उसके नए रूप जन्म नहीं ले पाए। माँ कालरात्रि ने अंततः रक्तबीज का वध कर दिया। इसके बाद, उन्होंने चंड, मुंड और शुंभ-निशुंभ जैसे अन्य महाबलशाली राक्षसों का भी संहार किया और तीनों लोकों में पुनः शांति और धर्म की स्थापना की।
माँ कालरात्रि का स्वरूप और महत्व
नवरात्रि के सातवें दिन पूजी जाने वाली माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और कल्याणकारी माना जाता है। माँ कालरात्रि का शरीर गहन काला रंग का है, उनके बाल बिखरे हुए रहते हैं और उनके गले में बिजली की तरह चमकती हुई माला सुशोभित होती है। वह चतुर्भुजी हैं; उनके चार हाथ हैं, जिनमें वह क्रमशः खड्ग (तलवार), लौह शस्त्र, वरमुद्रा (वरदान देने की मुद्रा) और अभयमुद्रा (भय मुक्ति की मुद्रा) धारण करती हैं। माँ का यह भयंकर स्वरूप वास्तव में भय, अंधकार और सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाला माना जाता है। इनकी पूजा से भक्तों को शत्रु भय, रोग और अकाल मृत्यु के डर से मुक्ति मिलती है, और जीवन में शुभता आती है।

माँ कालरात्रि की पूजा विधि
माँ कालरात्रि की पूजा करते समय इन चरणों का पालन करना चाहिए:
- व्रत संकल्प: सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और माँ कालरात्रि के व्रत का संकल्प लें।
- स्थापना और शुद्धिकरण: पूजा स्थान को साफ-सुथरा करें और माँ कालरात्रि की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। पूजा सामग्री को गंगाजल से शुद्ध करें।
- अर्घ्य और भोग: माँ को सिंदूर, कुमकुम, हल्दी, अक्षत (चावल), फूल और नारियल अर्पित करें।
- पाठ: धूप-दीप जलाएं और सिद्धकुंजिका स्तोत्र या अर्गला स्तोत्र का पाठ करें।
- उपासना का समय: इस दिन माँ कालरात्रि की मध्यरात्रि उपासना को सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है।
भोग और मंत्र
- भोग: माँ कालरात्रि को गुड़, ज्वार, नारंगी रंग का हलवा और पंचमेवा (पांच सूखे मेवे) चढ़ाना शुभ माना जाता है। इस दिन नारंगी रंग के वस्त्र पहनना भी मंगलकारी होता है।
- मंत्र: माँ की आराधना के लिए इस मंत्र का जाप करें:”ॐ देवी कालरात्र्यै नमः”
कालरात्रि माता की आरती
माँ कालरात्रि की स्तुति के लिए यह आरती गाई जाती है:
कालरात्रि जय जय महाकाली,
काल के मुंह से बचाने वाली।
दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा,
महा चंडी तेरा अवतारा।
पृथ्वी और आकाश पर सारा,
महाकाली है तेरा पसारा।
खंडा खप्पर रखने वाली,
दुष्टों का लहू चखने वाली।
कलकत्ता स्थान तुम्हारा,
सब जगह देखूं तेरा नजारा।
सभी देवता सब नर नारी,
गावे स्तुति सभी तुम्हारी।
रक्तदंता और अन्नपूर्णा,
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना।
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी,
ना कोई गम ना संकट भारी।
उस पर कभी कष्ट ना आवे,
महाकाली मां जिसे बचावे।
तू भी ‘भक्त’ प्रेम से कह,
कालरात्रि मां तेरी जय।
माँ कालरात्रि भक्तों के लिए हमेशा शुभ फलदायी होती हैं, इसलिए उन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। वह सभी बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश करती हैं।



