
खैरागढ़ के संडी क्षेत्र में प्रस्तावित चूना पत्थर खनन और सीमेंट फैक्ट्री के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। पंडरिया बिचारपुर भाठा में आयोजित किसान महापंचायत में हजारों की संख्या में ग्रामीण जुटे, जिन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वे अपनी उपजाऊ जमीन किसी भी निजी कंपनी को नहीं देंगे। यह विरोध प्रदर्शन अब केवल ज्ञापन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीणों ने इसे अपने अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई करार दिया है। किसानों के इस सख्त रुख से प्रशासन और संबंधित कंपनी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
महिलाओं ने संभाली कमान और गठित हुई नई संघर्ष समिति
Khairagarh की इस महापंचायत की सबसे बड़ी विशेषता महिलाओं की भारी भागीदारी रही। सभा में पहुंचे करीब 6 हजार लोगों में से 2 हजार से ज्यादा महिलाएं थीं, जो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगा रही थीं। आंदोलन को सुचारू और संगठित तरीके से चलाने के लिए ‘किसान अधिकार संघर्ष समिति’ का गठन किया गया है, जिसकी कमान लुकेश्वरी जंघेल और प्रियंका जंघेल जैसे स्थानीय चेहरों को सौंपी गई है। समिति ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार इस परियोजना को पूरी तरह रद्द नहीं कर देती, उनका यह संघर्ष बिना किसी समझौते के जारी रहेगा।
कंपनी समर्थकों और नेताओं के प्रवेश पर गांवों में लगा प्रतिबंध
Village स्तर पर लिए गए एक कड़े फैसले के तहत अब उन नेताओं और अधिकारियों का गांवों में आना प्रतिबंधित कर दिया गया है जो इस खनन परियोजना का समर्थन कर रहे हैं। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि कंपनी का कोई भी कर्मचारी या सर्वे टीम गांव की सीमा में कदम न रखे। यदि कोई इस सामाजिक प्रतिबंध का उल्लंघन करता है, तो उसका सामूहिक रूप से विरोध किया जाएगा। आंदोलन को और मजबूत करने के लिए पंडरिया भाठा को इस संघर्ष का मुख्य केंद्र बनाया गया है, जहां हर महीने किसान पंचायत आयोजित कर रणनीति तैयार की जाएगी।
जमीन बचाने की लड़ाई के साथ सामाजिक सेवा की अनूठी मिसाल
Movement के दौरान किसानों ने न केवल अपनी मांगों को बुलंद किया, बल्कि सामाजिक सरोकार की मिसाल भी पेश की। महापंचायत स्थल पर आयोजित रक्तदान शिविर में 47 किसानों ने रक्तदान किया, जिसका उपयोग सिकलिन और थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए किया जाएगा। विभिन्न समाज प्रमुखों ने भी इस मंच से किसानों को अपना समर्थन दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह जमीन उनकी मां के समान है और वे इसे बचाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ेंगे। इस ऐतिहासिक जुटान ने साफ कर दिया है कि खैरागढ़ के किसान अब किसी भी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं।



