
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील बनाने वाले रसोइयों का आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बुधवार को इस मामले पर बयान देते हुए कहा कि सरकार रसोइयों के मानदेय में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने के लिए तैयार है। हालांकि, आंदोलनकारी रसोइये अपनी मांग पर अड़े हुए हैं और वे 50 प्रतिशत की वृद्धि से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि शिक्षा विभाग के अधिकारी लगातार रसोइया संघ के संपर्क में हैं ताकि इस गतिरोध को खत्म किया जा सके।
आंदोलन के दौरान दो महिला रसोइयों की मौत
नया रायपुर के तूता धरना स्थल पर प्रदर्शन कर रही दो महिला रसोइयों की मौत की खबर ने आंदोलन में गम और गुस्से का माहौल पैदा कर दिया है। रसोइया संघ के अनुसार, बालोद की रुक्मणी सिन्हा और सलधा की दुलारी यादव की तबीयत प्रदर्शन के दौरान बिगड़ी थी। दुलारी यादव को गंभीर हालत में मेकाहारा अस्पताल भर्ती कराया गया था, जहां बुधवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। हालांकि, मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि रसोइयों की मौत का सीधा संबंध आंदोलन से नहीं है, लेकिन संघ का आरोप है कि धरना स्थल की बदहाली ने उनकी सेहत बिगाड़ दी।
धरना स्थल पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि तूता में सुविधाओं की भारी कमी है। कड़ाके की ठंड और खुले आसमान के नीचे बैठे हजारों रसोइयों के लिए रहने और खाने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। रसोइयों के अनुसार, वहां साफ पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है और गंदे टैंकरों के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। शौचालयों की गंदगी और टूटे-फूटे होने के कारण महिलाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे संक्रमण और डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
कलेक्टर दर पर मजदूरी की मांग
रसोइयों की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह उन्हें मिलने वाला बहुत कम पारिश्रमिक है। उनकी मांगों की सूची में सबसे ऊपर ‘कलेक्ट्रेट दर’ पर भुगतान की मांग शामिल है। रसोइयों का पक्ष इस प्रकार है:
- कम मानदेय: वर्तमान में रसोइयों को मात्र 66 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है।
- मजदूरी का अंतर: यह राशि सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी यानी कलेक्टर दर से भी काफी कम है।
- हड़ताल का समय: यह आंदोलन 29 दिसंबर 2025 से लगातार जारी है।
- प्रभाव: हड़ताल की वजह से राज्य के हजारों स्कूलों में मिड-डे मील का काम पूरी तरह ठप पड़ा है।
88 हजार रसोइयों के भविष्य का सवाल
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जानकारी दी कि पूरे प्रदेश में करीब 88 हजार से अधिक रसोइये कार्यरत हैं। सरकार का तर्क है कि 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी एक बड़ा वित्तीय भार है, जिसे वह वहन करने के लिए तैयार है। लेकिन रसोइया संघ का कहना है कि महंगाई के इस दौर में मात्र 66 रुपये में परिवार पालना नामुमकिन है। सरकार और रसोइयों के बीच इस खींचतान की वजह से स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों को दोपहर का भोजन नहीं मिल पा रहा है।
आगे क्या? आंदोलन और तेज होने के संकेत
दो साथियों की मौत के बाद रसोइया संघ ने अपने तेवर और कड़े कर लिए हैं। उनका कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जायज मांगों से पीछे नहीं हटेंगे। प्रशासन के लिए अब चुनौती यह है कि वह कैसे रसोइयों को मनाकर स्कूलों में मिड-डे मील व्यवस्था को दोबारा सुचारू रूप से शुरू करवाए। वहीं, विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में हैं, जिससे आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है।



