
छत्तीसगढ़ विधानसभा में ऑनलाइन डिलीवरी और राइड शेयरिंग कंपनियों (गिग वर्कर) में काम करने वाले युवाओं की सुरक्षा का मामला गरमाया। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने सदन में सरकार से इन श्रमिकों के भविष्य को लेकर तीखे सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि प्रदेश में स्विगी, जोमैटो और रैपिडो जैसी कंपनियों में हजारों युवा काम कर रहे हैं, लेकिन उनके लिए कोई ठोस नियम नहीं हैं। सरकार ने जवाब में कहा कि वह फिलहाल केंद्र सरकार के नियमों के आने का इंतजार कर रही है।
अजय चंद्राकर ने सुरक्षा और श्रेणी पर मांगे स्पष्ट जवाब
प्रश्नकाल के दौरान अजय चंद्राकर ने पूछा कि इन कंपनियों में काम करने वाले युवाओं को किस श्रेणी में रखा गया है। वे संगठित मजदूर हैं या असंगठित, इस पर स्थिति साफ होनी चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि 10 मिनट में डिलीवरी देने जैसे दबाव के कारण युवा अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। चंद्राकर का आरोप था कि कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं, जबकि कर्मचारी सड़क पर हादसों का शिकार हो रहे हैं।
श्रम विभाग के पास नहीं है कंपनियों का कोई रिकॉर्ड
सदन में चर्चा के दौरान एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। श्रम मंत्री लखनलाल देवांगन ने स्वीकार किया कि स्विगी, जोमैटो और ब्लिंकिट जैसी बड़ी कंपनियां श्रम विभाग में पंजीकृत ही नहीं हैं। पंजीयन न होने की वजह से विभाग के पास इस बात का कोई डेटा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में कुल कितने गिग वर्कर काम कर रहे हैं और उनमें से कितने स्थानीय युवा हैं।
वेतन और भर्ती प्रक्रिया पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं
विधायक चंद्राकर ने कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इन युवाओं की भर्ती किस आधार पर होती है और उनका वेतन कौन तय करता है। मंत्री ने जवाब दिया कि यह सब कंपनियों के अपने स्तर पर होता है। सरकार के पास इनकी भर्ती, शैक्षणिक योग्यता या सेवा शर्तों से जुड़ी कोई भी जानकारी या नियंत्रण की व्यवस्था फिलहाल नहीं है।
केंद्र की सामाजिक सुरक्षा संहिता पर टिकी सरकार की उम्मीदें
मंत्री लखनलाल देवांगन ने बताया कि केंद्र सरकार ने साल 2020 में सामाजिक सुरक्षा संहिता तैयार की है, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों को शामिल किया गया है। राज्य सरकार का कहना है कि जैसे ही केंद्र इस पर नियम अधिसूचित करेगा, छत्तीसगढ़ में भी उन्हें लागू कर दिया जाएगा। फिलहाल राज्य ने खुद का कोई अलग कानून बनाने की दिशा में कदम नहीं बढ़ाया है।
क्या छत्तीसगढ़ अपना अलग कानून बनाएगा?
अजय चंद्राकर ने सुझाव दिया कि चूंकि श्रम मामला समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए राज्य सरकार को केंद्र का इंतजार करने के बजाय अपना कानून बनाना चाहिए। उन्होंने राजस्थान जैसे राज्यों का उदाहरण दिया जिन्होंने अपने स्तर पर नियम बनाए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर देरी हुई तो प्रदेश के युवा शोषण का शिकार होते रहेंगे।
गिग इकोनॉमी और युवाओं के शोषण का खतरा
सदन में इस बात पर जोर दिया गया कि गिग इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है और इसमें रोजगार की बड़ी संभावनाएं हैं। हालांकि, कानूनी सुरक्षा के अभाव में युवाओं को न तो पेंशन मिलती है और न ही बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं। चंद्राकर ने कहा कि तेज डिलीवरी के चक्कर में हो रही मौतों और आत्महत्या के मामलों पर रोक लगाने के लिए सरकार को सख्त नीति लानी ही होगी।
नेता प्रतिपक्ष ने मंत्री के जवाब पर ली चुटकी
बहस के दौरान माहौल तब हल्का हुआ जब नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने चुटकी लेते हुए कहा कि अजय चंद्राकर मंत्री के जवाबों से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि मंत्री को कोई ऐसी ‘संतुष्टि की दवा’ देनी चाहिए जिससे सवाल खत्म हों। हालांकि, इसके बाद मंत्री ने फिर दोहराया कि यह एक गंभीर विषय है और सरकार इस पर गंभीर है।
प्रदेश स्तर पर समिति बनाने और कार्रवाई की मांग
चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि पूर्व में एक समिति बनाई गई थी, लेकिन केंद्र के नए नियमों के आने के बाद प्रक्रिया सुस्त पड़ गई। विधायकों ने मांग की कि जब तक केंद्र के नियम नहीं आते, तब तक राज्य को एक स्थानीय निगरानी तंत्र बनाना चाहिए ताकि इन कंपनियों की मनमानी पर लगाम कसी जा सके।
मुख्य बिंदु जो सदन में चर्चा का विषय रहे:
- कंपनियों का पंजीयन: प्रमुख ऑनलाइन कंपनियां श्रम विभाग में रजिस्टर्ड नहीं हैं।
- कर्मचारियों की संख्या: सरकार के पास गिग वर्करों का कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है।
- सुरक्षा का अभाव: दुर्घटना होने पर कर्मचारियों के लिए किसी विशेष मुआवजे का प्रावधान नहीं है।
- कानूनी ढांचा: राज्य सरकार केंद्र के नियमों के बाद ही कार्रवाई करने की बात कह रही है।



