शिक्षा विभाग में ‘धुलाई’ घोटाला: वर्दी साफ करने के नाम पर कर्मचारी को बांटे 30 लाख, हर महीने खाते में आए 4 लाख

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। विभाग के एक मामूली कर्मचारी को वर्दी धुलाई और अन्य भत्तों के नाम पर महज कुछ महीनों के भीतर 30 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया। आरोप है कि जब वर्तमान प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) विजय टांडे कोटा में विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) थे, तब उन्होंने सरकारी खजाने से इस बड़ी राशि का बंदरबांट किया। इस सनसनीखेज गबन की लिखित शिकायत अब प्रदेश के प्रमुख सचिव तक पहुंच गई है, जिसमें डीईओ और एक जूनियर ऑडिटर पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

वर्दी धुलाई का अनोखा खेल: एक कर्मचारी पर लुटाए लाखों रुपये

युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अंकित गौरहा की शिकायत के मुताबिक, सितंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच कोटा शिक्षा विभाग में पदस्थ कर्मचारी देवेंद्र कुमार फाल्के के खाते में सरकारी खजाने से सीधे 30 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए। दस्तावेजों के अनुसार, यह राशि “वर्दी धुलाई भत्ता” और “अन्य भत्ते” के रूप में दिखाई गई है। हर महीने एक कर्मचारी को 4 से 4.5 लाख रुपये तक का भुगतान होता रहा, जो किसी भी चतुर्थ श्रेणी या तृतीय श्रेणी कर्मचारी के वेतन ढांचे से कोसों दूर है। बिना किसी उच्चाधिकारी की मिलीभगत के इतनी बड़ी रकम का आहरण संभव नहीं माना जा रहा है।

प्रभारी डीईओ पर आरोप: बीईओ रहते हुए सरकारी खजाने में लगाई ‘सेंध’

शिकायत में सीधे तौर पर प्रभारी डीईओ विजय टांडे को निशाने पर लिया गया है। आरोप है कि जब वे कोटा में बीईओ थे, तब वे खुद ही आहरण एवं संवितरण अधिकारी (DDO) की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनकी अनुमति और हस्ताक्षर के बिना 30 लाख रुपये का भुगतान नहीं हो सकता था। हैरानी की बात यह है कि जिस अधिकारी पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे और जिनके खिलाफ कोटा थाने में एफआईआर तक दर्ज हुई, शासन ने उन्हें दंडित करने के बजाय पदोन्नत कर पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था की कमान सौंप दी।

कागजों में हेरफेर: बजट और व्यय पत्रक में छिपाई गई सच्चाई

भ्रष्टाचार के इस खेल को दबाने के लिए विभाग के भीतर दस्तावेजों में भी जमकर काट-छांट की गई। शिकायत के अनुसार, जिला शिक्षा कार्यालय में जमा होने वाले मासिक व्यय पत्रक (Monthly Expenditure Statement) और बजट से जुड़े कागजातों में गबन की राशि को चतुराई से छिपाया गया। हार्ड कॉपी में कुछ और आंकड़े दिखाए गए, जबकि बैंक ट्रांजैक्शन और वास्तविक वित्तीय स्थिति कुछ और ही बयां कर रही है। इसमें स्थापना शाखा के जूनियर ऑडिटर सुनील यादव की भूमिका को भी संदिग्ध बताया गया है।

अनुकंपा नियुक्ति में धांधली: अपात्रों को रेवड़ी की तरह बांटी नौकरियां

घोटाले की फेहरिस्त केवल पैसों के गबन तक सीमित नहीं है। अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में भी नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं। आरोप है कि जिन परिजनों का हक बनता था, उन्हें दरकिनार कर दिया गया और आर्थिक लाभ लेकर अपात्र लोगों को शिक्षा विभाग में नियुक्तियां दे दी गईं। इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक मापदंडों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस खेल में एक पूरा सिंडिकेट काम कर रहा है जो पात्र उम्मीदवारों की फाइलों को सालों तक दबाए रखता है।

युक्तियुक्तकरण का ‘खेला’: बिना नोटशीट के बदल दिए 200 शिक्षक

शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण (Rationalization) में भी भारी फर्जीवाड़ा सामने आया है। बिना किसी जिला या विकासखंड स्तरीय समिति के अनुमोदन के करीब 200 शिक्षकों के ट्रांसफर और संशोधन आदेश जारी कर दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इन आदेशों में न तो सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर हैं और न ही कोई नोटशीट तैयार की गई। कई मामलों में तो हाई कोर्ट के आदेशों की गलत व्याख्या कर अपने चहेते शिक्षकों को मनचाही जगहों पर पदस्थापना दे दी गई, जबकि बाकी शिक्षक भटकते रहे।

एफआईआर के बाद भी मेहरबानी: आखिर क्यों नहीं हुई ठोस कार्रवाई?

कोटा थाने में मामला दर्ज होने और कलेक्टर की समय-सीमा बैठक में निर्देश मिलने के बावजूद विजय टांडे के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, उन्होंने खुद को बचाने के लिए निचले स्तर के क्लर्क और भृत्य को निलंबित कर बलि का बकरा बना दिया। शिकायत में इसे प्रशासनिक उदासीनता का चरम बताया गया है। सवाल उठ रहे हैं कि जिस अधिकारी के खिलाफ जांच की अनुशंसा की गई थी, उन्हें उसी जिले में प्रभारी डीईओ की कुर्सी देकर जांच को प्रभावित करने का मौका क्यों दिया गया?

जांच प्रभावित होने का डर: स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग

अंकित गौरहा ने प्रमुख सचिव से मांग की है कि विजय टांडे और सुनील यादव को तत्काल प्रभाव से पद से हटाकर निलंबित किया जाए। उनका तर्क है कि अगर आरोपी अधिकारी अपने पद पर बने रहते हैं, तो वे पूर्व में की गई गड़बड़ियों के साक्ष्य मिटा सकते हैं और गवाहों को डरा-धमका सकते हैं। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र उच्च स्तरीय कमेटी या जांच एजेंसी से कराई जाए, ताकि विभाग में हुए इस 30 लाख के ‘धुलाई घोटाले’ की सच्चाई जनता के सामने आ सके।

भ्रष्टाचार की लंबी फेहरिस्त: शपथ-पत्र के साथ लगी शिकायतों का अंबार

शिकायत के साथ कई ऐसे दस्तावेज और शपथ-पत्र भी सौंपे गए हैं जो विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की पुष्टि करते हैं। इसमें दिवंगत शिक्षक पुष्कर भारद्वाज की पत्नी द्वारा लगाए गए रिश्वत के आरोपों का भी जिक्र है। जांच में यह शिकायत सही पाई गई थी, लेकिन तब भी केवल छोटे बाबू पर गाज गिरी और बड़े अधिकारियों को अभयदान मिल गया। विभाग के भीतर चल रही इस गुटबाजी और भ्रष्टाचार ने बिलासपुर जिले के शैक्षणिक वातावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है।

क्या समितियां सिर्फ दिखावा हैं? प्रशासनिक ढांचे पर सवाल

अंत में, इस पूरे प्रकरण ने छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के प्रशासनिक ढांचे पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जब हर बड़े निर्णय के लिए समितियां बनी हुई हैं, तो एक अकेला अधिकारी बिना अनुमोदन के इतने बड़े फैसले कैसे ले रहा है? क्या ये समितियां सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? स्थानीय शिक्षकों और कर्मचारियों में इस घोटाले को लेकर गहरा आक्रोश है। अब देखना यह होगा कि प्रमुख सचिव के पास पहुंची इस शिकायत के बाद क्या सरकार कड़ा फैसला लेती है या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों की तरह दबा दिया जाएगा।

Also Read: इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में महाघोटाला: वैज्ञानिकों ने छात्रों के पैसे से बनाई ‘पेंशन की जादुई स्कीम’

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button