Impact of War: युद्ध की तपिश पहुंची गांव की रसोई तक, गैस संकट के बीच फिर लौटा चूल्हा युग

Gas Cylinder Crisis: मिडिल ईस्ट के बिच हो रहे युद्ध के परिणामों ने अब छत्तीसगढ़ के सुदूर इलाकों की रसोई में भी दस्तक दे दी है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच गहराते अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का सीधा असर भारत में रसोई गैस की सप्लाई चेन पर पड़ा है। कच्चे तेल और गैस की कीमतों में अस्थिरता और सप्लाई बाधित होने से घरेलू गैस सिलेंडर की किल्लत शुरू हो गई है। हालात यह हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में गैस बुकिंग के 25 से 45 दिन बीतने के बाद भी उपभोक्ताओं को डिलीवरी के लिए जरूरी ओटीपी (OTP) नहीं मिल रहा है। इस अनिश्चितता ने आम आदमी को एक बार फिर पारंपरिक रास्तों पर लौटने को मजबूर कर दिया है।

कंडे और लकड़ी की मांग में भारी उछाल

गैस सिलेंडर न मिलने के कारण अब कंडों (छेने) और जलाऊ लकड़ी की मांग अचानक बढ़ गई है। स्थिति यह है कि शहर के लोग भी अब ईंधन की तलाश में गांवों का रुख कर रहे हैं, जिससे कंडों की कीमतों में भी तेजी आ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं सुबह होते ही सड़कों और रास्तों पर गोबर इकट्ठा करने निकल रही हैं ताकि घर का चूल्हा जलाया जा सके। वहीं, नदी किनारे और नर्सरी के पास सूखी लकड़ियां जुटाने वालों की भीड़ देखी जा सकती है। महिलाओं का कहना है कि गैस के ऊंचे दाम और लंबी वेटिंग से बेहतर है कि वे खुद मेहनत कर ईंधन का जुगाड़ करें।

मवेशियों की बढ़ी पूछपरख, सड़कों से गायब हुए आवारा पशु

ईंधन संकट के इस दौर में एक दिलचस्प सामाजिक बदलाव भी देखने को मिल रहा है। गोबर की बढ़ती अहमियत की वजह से अब किसान अपने मवेशियों को छुट्टा नहीं छोड़ रहे हैं। पशुओं को शाम ढलते ही ढूंढकर कोठार में सुरक्षित बांधा जा रहा है ताकि उनके गोबर का इस्तेमाल ईंधन के लिए किया जा सके। इसके चलते सड़कों पर आवारा घूमने वाले मवेशियों की संख्या में काफी कमी आई है। जो पशु पहले बोझ समझे जाते थे, आज उनके चारे और पानी की विशेष चिंता की जा रही है क्योंकि वे ईंधन का मुख्य स्रोत बन गए हैं।

उज्ज्वला के दौर में फिर चमके मिट्टी के चूल्हे

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने देश की करोड़ों महिलाओं को लकड़ी के धुएं से राहत दी थी और रसोई का काम मिनटों में होने लगा था। लेकिन वैश्विक युद्ध की परिस्थितियों ने इस आधुनिक व्यवस्था को तगड़ा झटका दिया है। वर्तमान संकट के कारण बाजारों में अब लोहे के चूल्हों की बिक्री बढ़ गई है और मिट्टी के चूल्हे बनाने वाले कारीगरों की मांग फिर से लौट आई है। कई घरों में गैस चूल्हा होने के बावजूद ईंटों का अस्थायी स्टैंड बनाकर खाना पकाया जा रहा है ताकि सिलेंडर को केवल आपात स्थिति के लिए बचाकर रखा जा सके।

पुरानी पद्धति का स्वाद और स्वास्थ्य का तर्क

बदलते हालातों के बीच लोग अपनी मजबूरी को अब सकारात्मक नजरिए से भी देखने लगे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी की धीमी आंच पर बने खाने का स्वाद गैस के खाने से कहीं बेहतर होता है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि गैस पर बना भोजन करने से उन्हें एसिडिटी की शिकायत रहती थी, जो अब कम हो गई है। आधुनिकता के इस दौर में समाज का अपनी जड़ों की ओर लौटना इस बात की ओर इशारा करता है कि बड़े संकट इंसान को फिर से पारंपरिक जीवनशैली की याद दिला देते हैं।

इतिहास ने खुद को दोहराया, आधुनिकता पर भारी पड़ी जरूरत

मौजूदा हालात को देखकर बुजुर्गों का कहना है कि इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है। जिस चूल्हे और जलाऊ लकड़ी को लोग पीछे छोड़ आए थे, आज वही उनके जीने का सहारा बन रहे हैं। युद्ध की विभीषिका केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका असर दूर-दराज के गांवों की थाली तक पहुंचता है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक गांव की रसोई में चूल्हे का धुआं और लकड़ी की तपिश इसी तरह बनी रहने की संभावना है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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