
8th Pay Commission: देशभर के लाखों केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए आठवें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही भत्तों और वेतन में बढ़ोतरी की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। कर्मचारी संगठनों की ओर से वेतनमान में सुधार को लेकर कई बड़े प्रस्ताव और मांगें आयोग के सामने रखी जा रही हैं। इसके उलट जमीनी स्तर पर जो खबरें छनकर आ रही हैं, वे कर्मचारियों को निराश करने वाली हैं। सरकारी सूत्रों और कर्मचारी संघ के प्रतिनिधियों का दबी जुबान में मानना है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और बजट के सीमित दायरे को देखते हुए सरकार कर्मचारियों की सभी बड़ी मांगों को हूबहू स्वीकार करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिख रही है।
राजकोषीय घाटा और पेंशन का भारी बोझ संतुलित करने की बड़ी चुनौती
कर्मचारी संघ के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि आठवां वेतन आयोग केवल कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने का जरिया नहीं है। सरकार के सामने इस वक्त देश की समूची अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। चालू वित्तीय वर्ष में राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना, लगातार बढ़ती पेंशन देनदारियों का प्रबंधन करना और बाजार में महंगाई को स्थिर रखना सरकार की मुख्य प्राथमिकताएं हैं। ऐसी स्थिति में यदि सरकार बिना किसी ठोस वित्तीय योजना के कर्मचारियों के वेतन में बेतहाशा बढ़ोतरी की घोषणा करती है, तो इससे देश के खजाने पर असहनीय दबाव पड़ेगा जिसका सीधा असर आम जनता से जुड़ी विकास योजनाओं पर पड़ सकता है।
फिटमेंट फैक्टर को 3.83 करने की मांग पर अड़ सकती है सरकार, बीच का रास्ता निकालने की तैयारी
कर्मचारी यूनियनों की सबसे प्रमुख मांग न्यूनतम मूल वेतन को बढ़ाने के लिए फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 3.83 गुना करने की है। फिटमेंट फैक्टर जितना ज्यादा होगा, कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और भत्ते उतने ही ऊंचे स्तर पर पहुंचेंगे। हालांकि, वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि इस मांग को पूरी तरह मानना व्यावहारिक नहीं है। केंद्र सरकार अगर इसमें भारी बढ़ोतरी करती है, तो इसका सीधा असर केवल केंद्रीय बजट पर ही नहीं होगा बल्कि देश के सभी राज्यों पर भी पड़ेगा क्योंकि केंद्रीय वेतनमान के तुरंत बाद राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों के लिए इसी तर्ज पर वेतन बढ़ाती हैं। इसलिए सरकार कोई बीच का रास्ता तलाश रही है।
पुरानी पेंशन योजना यानी OPS की शत-प्रतिशत बहाली अब वित्तीय रूप से आसान नहीं
आठवें वेतन आयोग की बहसों के बीच पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को दोबारा लागू करने का मुद्दा सबसे ज्यादा गरमाया हुआ है। कर्मचारी संगठनों का साफ कहना है कि नई पेंशन योजना (एनपीएस) पूरी तरह से शेयर बाजार के जोखिमों पर आधारित है और सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित नहीं करती है। इसके विपरीत, ओपीएस में कर्मचारी को उसके अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत हिस्सा महंगाई भत्ते के साथ गारंटी के तौर पर मिलता है। कर्मचारी नेताओं ने खुद यह स्वीकार किया है कि इतने सालों बाद एनपीएस को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है क्योंकि इस सिस्टम में कर्मचारियों और सरकार दोनों का करोड़ों रुपए का अंशदान फंसा हुआ है।
यूनिफाइड पेंशन स्कीम के बढ़ते वित्तीय भार को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल
कर्मचारियों के भारी विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने हाल ही में यूनिफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) का विकल्प पेश किया है। इस नई व्यवस्था के तहत सरकार ने अपने हिस्से का वित्तीय योगदान बढ़ाकर 18.5 प्रतिशत करने का बड़ा प्रस्ताव दिया है। इसके बावजूद आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि लंबे समय तक सरकारी खजाने से अंशदान के इस ऊंचे स्तर को बनाए रखना देश की वित्तीय सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसी वजह से कर्मचारी संगठन अब एनपीएस को सिरे से खारिज करने की जिद छोड़कर ओपीएस जैसी निश्चित सुरक्षा की गारंटी पाने के लिए सरकार से बीच का रास्ता निकालने की बातचीत कर रहे हैं।
न्यूनतम वेतन की गणना के लिए तीन के बजाय पांच सदस्यों की ‘फैमिली यूनिट’ मानने पर जोर
फिटमेंट फैक्टर के विवाद के बीच कर्मचारी संगठनों ने न्यूनतम वेतन के निर्धारण के नियमों में भी बदलाव की मांग की है। यूनियन इस बात पर अड़ी हैं कि कर्मचारी के घरेलू खर्चों के आकलन के लिए ‘फैमिली यूनिट’ का आकार 3 सदस्यों से बढ़ाकर 5 सदस्य किया जाना चाहिए। यूनियनों की दलील है कि तीन सदस्यों का पुराना फॉर्मूला कई दशक पुराना हो चुका है और आज के समय में एक नौकरीपेशा व्यक्ति पर केवल उसकी पत्नी और बच्चों की ही नहीं बल्कि बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख की भी पूरी जिम्मेदारी होती है।
आसमान छूती महंगाई के दौर में स्वास्थ्य और शिक्षा के बढ़ते खर्चों का दिया गया हवाला
कर्मचारी संगठनों ने आयोग के सामने तर्क दिया है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर रहन-सहन की लागत में भारी बदलाव आया है। आज के समय में बच्चों की उच्च शिक्षा, परिवार के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और शहरी इलाकों में मकान का किराया आसमान छू रहा है। ऐसी स्थिति में महज तीन सदस्यों के खर्च के आधार पर न्यूनतम वेतन तय करना कर्मचारियों के साथ सरासर नाइंसाफी होगी। पांच सदस्यों की इकाई मानकर जब वेतन तय होगा, तभी कर्मचारियों को महंगाई के इस दौर में एक सम्मानजनक जीवन स्तर मिल सकेगा।
अत्यधिक वेतन वृद्धि से बाजार में महंगाई और बढ़ने की अर्थशास्त्रियों ने दी कड़ी चेतावनी
देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों ने सरकार को इस संबंध में कई बार सचेत किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वेतन और पेंशन में अचानक बहुत ज्यादा बढ़ोतरी करने से बाजार में नकदी का प्रवाह अचानक बढ़ जाएगा। जब लोगों के हाथों में जरूरत से ज्यादा पैसा आएगा, तो वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ेगी जिससे देश में महंगाई की एक नई लहर आ सकती है। सरकार इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे संतुलित फॉर्मूले पर काम कर रही है जिससे कर्मचारियों की सामाजिक जरूरतें भी पूरी हो जाएं और देश के बजट पर भी अतिरिक्त बोझ न पड़े।
जून के महीने में लखनऊ में सजेगा आयोग का मंच, विभिन्न यूनियनों के साथ होगा सीधा परामर्श
आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों को अंतिम रूप देने की प्रशासनिक तैयारियां अब तेजी से आगे बढ़ रही हैं। इसी सिलसिले में देश के अलग-अलग हिस्सों में परामर्श बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। आगामी 22 और 23 जून को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी बैठक आयोजित होने जा रही है। इस दो दिवसीय बैठक में वेतन आयोग के चेयरमैन और सदस्य उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों, स्वायत्तशासी संस्थानों और केंद्रीय कर्मचारी यूनियनों के प्रतिनिधियों के साथ आमने-सामने बैठकर उनकी समस्याओं और मांगों को सुनेंगे।
आखिरी फैसला कर्मचारी संगठनों की मांगों पर नहीं, बल्कि सरकार की वित्तीय क्षमता पर टिकेगा
लखनऊ में होने वाली इस अहम बैठक को लेकर उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के केंद्रीय कर्मचारियों में भारी उत्सुकता है। हालांकि, प्रशासनिक विशेषज्ञों ने पहले ही साफ कर दिया है कि आयोग अपनी रिपोर्ट केवल यूनियनों द्वारा सौंपे गए मांग पत्रों के आधार पर तैयार नहीं करेगा। अंतिम निर्णय लेते समय इस बात को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाएगी कि प्रस्तावित वेतन वृद्धि के बाद जो अतिरिक्त वित्तीय बोझ आएगा, उसे उठाने की क्षमता वर्तमान में सरकार की है या नहीं।
चुनावी वर्ष और राजनीतिक नफे-नुकसान के आकलन के बाद ही खुलेगा सरकारी फैसलों का पत्ता
आठवें वेतन आयोग की इस पूरी कवायद को देश के राजनीतिक समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लाखों कर्मचारियों और उनके परिवारों का वोट बैंक किसी भी सरकार के लिए बेहद मायने रखता है। ऐसे में सरकार पूरी तरह से हाथ खींचने का जोखिम भी नहीं ले सकती है। माना जा रहा है कि सरकार आयोग के माध्यम से वेतन में इतनी रियायत जरूर देगी जिससे कर्मचारी पूरी तरह नाराज न हों और देश की अर्थव्यवस्था को भी कोई नुकसान न पहुंचे। अंतिम घोषणाओं के लिए कर्मचारियों को अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।



