
CG Congress Transition: छत्तीसगढ़ कांग्रेस के विशेष प्रशिक्षण शिविर में पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी का चार घंटे का दौरा सूबे की सियासत में कई गहरे सियासी मायने छोड़ गया है। बंद कमरे में आयोजित हुई इस मैराथन बैठक के दौरान राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया कि पार्टी अब केवल पुराने और स्थापित चेहरों के भरोसे आगे नहीं बढ़ेगी। आलाकमान का मुख्य फोकस अब संगठन के भीतर से नया और ऊर्जावान नेतृत्व तैयार करने पर है। राहुल गांधी के इस बदले रुख से साफ है कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे में बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है।
जिलाध्यक्षों की कतार से ही निकलेंगे भविष्य के भूपेश, टीएस और महंत
बैठक के दौरान राहुल गांधी का पूरा ध्यान बड़े दिग्गज नेताओं के बजाय जमीनी स्तर पर काम करने वाले जिलाध्यक्षों पर केंद्रित रहा। उन्होंने करीब ढाई घंटे तक प्रदेश के 41 जिलाध्यक्षों के साथ आमने-सामने बैठकर संवाद किया। इस बातचीत के दौरान उन्होंने तीन जिलाध्यक्षों को मिसाल के तौर पर मंच पर खड़ा किया। राहुल गांधी ने उपस्थित पदाधिकारियों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि अगर आप संगठन के लिए पूरी ईमानदारी से जमीन पर पसीना बहाएंगे, तो पार्टी किसी भी साधारण कार्यकर्ता को शीर्ष पद पर बैठाने से नहीं हिचकेगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य का मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष इसी कतार में बैठे किसी व्यक्ति में से ही चुना जा सकता है।

दिल्ली की परिक्रमा या लॉबिंग से नहीं, जिलों के प्रदर्शन से तय होगी टिकट
सत्र के दौरान राहुल गांधी ने नेताओं को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि भविष्य में किसी का भी राजनीतिक कद दिल्ली या रायपुर के बड़े बंगलों में की जाने वाली लॉबिंग से तय नहीं होगा। चुनाव में किसे टिकट मिलेगी और किसे संगठन में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, इसका एकमात्र पैमाना जिले में किया गया काम ही होगा। उन्होंने पदाधिकारियों को हिदायत दी कि जो नेता लगातार जनता के बीच एक्टिव रहेंगे, केवल उन्हें ही पार्टी में तरजीह दी जाएगी। पिछले एक दशक से प्रदेश की राजनीति जिन गिने-चुने चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, उनके लिए यह संदेश एक तरह से नई चेतावनी की तरह देखा जा रहा है।
सार्वजनिक बयानबाजी पर बरसे राहुल, कहा आपसी गुटबाजी से कमजोर होता है संगठन
पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही खींचतान और आंतरिक अंतर्कलह को लेकर राहुल गांधी ने अपनी गहरी चिंता और नाराजगी खुलकर जाहिर की। उन्होंने वरिष्ठ नेताओं को दोटूक शब्दों में कहा कि मीडिया के माध्यम से एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और व्यक्तिगत बयानबाजी करने से संगठन की छवि खराब होती है। इस तरह की आपसी गुटबाजी का सीधा राजनीतिक फायदा विपक्षी दल भाजपा को मिलता है। उन्होंने सभी नेताओं को व्यक्तिगत मतभेदों को भुलाकर सार्वजनिक मंचों पर एकजुट दिखने और आपसी तालमेल को बेहतर बनाने की सख्त सलाह दी है।
दो अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों से मिलकर टटोली संगठन की वास्तविक नब्ज
अभनपुर पहुंचने के बाद राहुल गांधी ने अपनी रणनीतिक बैठकों को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटा। सबसे पहले उन्होंने राज्य के शीर्ष नेताओं के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव और चरणदास महंत सहित पूर्व मंत्री शामिल थे। इसके तुरंत बाद उन्होंने पूर्व विधायकों और जिला स्तर के संगठन पदाधिकारियों की एक अलग बैठक ली। इन दोनों ही चर्चाओं में चुनावी समीकरणों से ज्यादा संगठन की अनुशासनहीनता को दूर करने और लंबे समय से मायूस बैठे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की रणनीति पर मंथन हुआ।

केवल प्रशिक्षण सत्र नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव का शंखनाद है यह शिविर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभनपुर में आयोजित यह शिविर महज एक रूटीन सांगठनिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि कांग्रेस ने इसके जरिए साल 2028 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछानी शुरू कर दी है। शिविर का मुख्य उद्देश्य पदाधिकारियों को आने वाले समय के लिए तैयार करना है। इसके तहत सभी जिलाध्यक्षों को अपने-अपने क्षेत्रों के गांवों में रात गुजारने, सीधे ग्रामीणों की चौपालों में शामिल होने, मनरेगा की जमीनी हकीकत परखने और स्थानीय स्तर पर फैले सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता से काम करने की सख्त जिम्मेदारी सौंपी गई है।
जल, जंगल और जमीन के संवेदनशील मुद्दों पर बड़े जन आंदोलन की रूपरेखा तैयार
आगामी महीनों में सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए कांग्रेस अब बस्तर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों को लेकर एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने जा रही है। प्रशिक्षण शिविर के दौरान इस प्रस्तावित आंदोलन की पूरी रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा की गई। सभी जिला प्रभारियों और अध्यक्षों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने जिलों के स्थानीय जल संकट, वनाधिकार पट्टों की समस्या और जमीन अधिग्रहण से जुड़े विवादों की सूची तैयार करें। पार्टी का मानना है कि जनता के बुनियादी अधिकारों की लड़ाई लड़कर ही दोबारा खोई हुई जमीन वापस पाई जा सकती है।
चार घंटे के संक्षिप्त दौरे में साफ हुई भविष्य की पूरी राजनीतिक दिशा
राहुल गांधी का यह छत्तीसगढ़ दौरा भले ही महज चार घंटे का था, लेकिन इसके जरिए उन्होंने प्रदेश कांग्रेस के लिए तीन बेहद स्पष्ट और कड़े संदेश दे दिए हैं। पहला यह कि संगठन में तरक्की का आधार अब वरिष्ठता की बजाय सीधे तौर पर फील्ड का परफॉर्मेंस होगा। दूसरा संदेश यह कि गुटबाजी और अनुशासनहीनता करने वाले किसी भी बड़े नेता को अब बख्शा नहीं जाएगा। और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह कि पार्टी अब पुराने ढर्रे को छोड़कर हर हाल में नई पीढ़ी के लीडर्स को फ्रंट लाइन में लाने के मिशन पर तेजी से काम शुरू करने जा रही है।
पावर शिफ्ट की आहट से लेकर जमीनी रिपोर्ट के आधार पर फैसले के संकेत
इस पूरे दौरे के बाद से कांग्रेस के अंदरूनी हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा संगठन में होने वाले संभावित ‘पावर शिफ्ट’ को लेकर है। राहुल गांधी का जिलाध्यक्षों को ढाई घंटे का समय देना और सीनियर नेताओं के साथ सीमित चर्चा करना इस बात की गवाही दे रहा है कि अब फैसलों का केंद्र बदलने वाला है। दिल्ली के सियासी गलियारों में भी यह चर्चा आम है कि छत्तीसगढ़ की आगामी राजनीति केवल तीन-चार चेहरों तक सीमित नहीं रहेगी। अब आलाकमान सीधे ग्राउंड रिपोर्ट और खुफिया सर्वे के आधार पर ही ब्लॉक और जिला स्तर के पदाधिकारियों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करेगा।



