Compassionate Appointment Married Daughter: क्या विवाहित होने से खत्म हो जाता है पिता पर अधिकार? जानें अनुकंपा नियुक्ति पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

Bilaspur High Court Compassionate Appointment Married Daughter: बिलासपुर हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित बेटी को केवल इस अनुमान पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह शादी के बाद अपने पति पर ही निर्भर है। अदालत ने कहा कि निर्भरता एक तथ्यात्मक विषय है, जिसे प्रत्येक मामले में साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने संबंधित बैंक को निर्देश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता के आवेदन पर 30 दिनों के भीतर नए सिरे से निर्णय ले।

शादीशुदा होना बाहर करने का आधार नहीं

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि शादीशुदा होना किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति के दायरे से बाहर करने का वैधानिक आधार नहीं हो सकता, जब तक कि संबंधित संस्थान की नीति में इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित न किया गया हो। याचिकाकर्ता ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में कार्यरत अपने पिता के निधन के बाद दया के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन दिया था। बैंक ने इस तर्क के साथ याचिका खारिज कर दी थी कि विवाहित होने के कारण महिला अपने पति पर आश्रित मानी जाएगी, इसलिए उसे दिवंगत कर्मचारी का निर्भर सदस्य नहीं माना जा सकता।

बैंक नीति और निर्भरता के तथ्य

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि बैंक की नीति में विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखने का कोई स्पष्ट नियम नहीं है। वह आर्थिक रूप से पूरी तरह अपने पिता पर ही आश्रित थी। अदालत ने बैंक की नीति का अवलोकन करने के बाद पाया कि आश्रित परिवार के सदस्यों की परिभाषा में बेटी को शामिल किया गया है और इसमें विवाहित या अविवाहित बेटी के बीच कोई भेद नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता ने अपनी आर्थिक स्थिति का ब्यौरा आवेदन में दिया था, जिसके खिलाफ बैंक कोई विपरीत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। बैंक ने केवल धारणा के आधार पर निर्णय लिया था।

जेंडर रूढ़िवादिता और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि वैवाहिक स्थिति के आधार पर बेटियों को प्रक्रिया से बाहर रखना जेंडर आधारित रूढ़िवादी सोच को दर्शाता है। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) में दिए गए समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। अदालत ने माना कि बिना किसी ठोस आधार के सिर्फ विवाह के कारण किसी बेटी के आवेदन को अस्वीकार करना मनमाना रवैया है।

Also Read: अनुकंपा नियुक्ति के लिए देरी मान्य नहीं: हाईकोर्ट ने खारिज की अपील, बताया क्यों खत्म हुआ योजना का मूल उद्देश्य

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button